डा. रवीन्द्र अरजरिया
देश की राजनीति निम्नता की चरम सीमा पर पहुंचती जा रही है। समाज सेवा के सर्वोच्च मापदण्डों पर स्थापित सत्ता के गलियारों में अब सिंहासन तक पहुंचने के लिए व्यक्तिगत, जातिगत, क्षेत्रगत, भाषागत, सम्प्रदायगत जैसे मुद्दों को प्रचारित किया जा रहा है ताकि वर्ग-विभाजन करके वोट बैंक में इजाफा किया जा सके। राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर भी लोकप्रियता की ऊंचाइयां पाने की मंशा में पागल हो चुके चन्द राजनेताओं ने अपनी भाषा, हावभाव और आचरण से देश की अस्मिता को तार-तार करना शुरू कर दिया है।
‘आपरेशन सिंदूर’ तक पर विपक्षी दलों ने मनमाने आरोप लगाना शुरू कर दिये हैं। प्रमाणिकता की परिधि से कहीं दूर जाकर सोशल मीडिया पर उत्तेजनात्मक संवाद, दृश्य और दृष्टान्त डलवाये जा रहे हैं ताकि सामाजिक एकरसता को विभाजित करके चौधरी बना जा सके। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की निजी जिन्दगी तक को निशाने पर लिया और सेना के पराक्रम पर केन्द्रित ‘आपरेशन सिंदूर’ की तर्ज पर ‘आपरेशन बंगाल’ करने की चुनौती तक दे डाली। चुनावी समर में रोहिंग्या, बंगलादेशी सहित अन्य विदेशी घुसपैठियों की दम पर जीत का दावा करते हुए तत्काल चुनाव कराने, मुक्त संवाद करने तथा सीधा मोर्चा खोलने की बात कहने वाली तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ने अपनी तानाशाही का परचम एक बार फिर फहराने की कोशिश ही की है।
अतीत गवाह है कि ममता बनर्जी पर हमेशा से ही राष्ट्रद्रोहियों, घुसपैठियों तथा असामाजिक तत्वों को आश्रय देने के आरोप लगते रहे है। अतिगम्भीर आरोपियों का पक्ष लेकर राज्य सरकार ने संदेशखाली में महिलाओं का यौन शोषण, जबरन वसूली, जमीन हडपने जैसे आपराधिक कृत्यों के आरोपियों को कथित रूप से बचाने हेतु उच्चतम न्यायालय तक के दरवाजे पर दस्तक तक दी थी। राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत की गई याचिका पर सवालिया निशान लगाते हुए जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की बेंच ने पश्चिम बंगाल सरकार के वकील अभिषेक सिंहवी से पूछा था कि एफआईआर चार साल पहले दर्ज की गई थी।
आरोपी कौन है? गिरफ्तारियां कब की गईं? किसी को बचाने में राज्य सरकार की दिलचस्पी क्यों होना चाहिए? उल्लेखनीय है कि संदेशखाली काण्ड में तृणमूल कांग्रेस नेता शाहजहां शेख, शिबू हाजरा, उत्तम सरदार, रंजू, संजू सहित अन्य लोगों के नाम उभर कर सामने आये थे। केन्द्रीय एजेन्सियों के कामों में दखल देने से लेकर राज्यपाल की गरिमा तक को प्रभावित करने वाली पार्टी की तानाशाही के सामने देश का संविधान जार-जार आंसू रोता रहा है। मुर्शिदाबाद में 70 प्रतिशत से अधिक पहुंच चुकी मुस्लिम आबादी ने अब वहां जेहादी परचम फहराना शुरू कर दिया है।
कश्मीरी हिन्दुओं की तर्ज पर गैर मुस्लिम समुदाय को क्षेत्र छोडने की धमकी दी जा रही है। पश्चिम बंगाल उच्च न्यायालय द्वारा गठित जांच समिति ने मुर्शीदाबाद काण्ड के लिए ममता सरकार को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया हैं। जांच आख्या में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं व्दारा दंगा भडकाने तथा नेतृत्व करने, स्थानीय प्रशासन व्दारा निष्क्रियता बरतने, केवल हिन्दुओं को निशाना बनाने, पुलिस व्दारा जानबूझकर उपेक्षा करने जैसे अनेक खुलासे किये गये हैं। वहां के राज्यपाल सी. वी. आनन्द बोस ने गृह मंत्रालय को भेजी अपनी रिपोर्ट में तो कट्टरपंथ और उग्रवाद को प्रदेश के लिए बडा खतरा बताते हुए बंगलादेश की सीमा पर स्थित मुर्शीदाबाद, दिनाजपुर और मालदा जिलों में अल्पसंख्यक हो चुके हिन्दुओं की सुरक्षा पर भी प्रश्नचिन्ह अंकित किये हैं। मुर्शीदाबाद का पूरा घटनाक्रम पहले से निर्धारित षडयंत्र की व्यवहारिक परिणति थी।
मालूम हो कि इसी क्षेत्र में 14 दिसम्बर 2019 में सीएए के विरोध में रेलवे स्टेशन, बसों, सार्वजनिक प्रतिष्ठानों, हिन्दुओं की दुकानों-मकानों-वाहनों तक में तोडफोड-लूटपाट की गई थी। लालगोला और कृष्णापुर स्टेशन पर 5 ट्रेनों में आग लगा दी गई थी। सूती में पटरियां तोड दी गईं थी।
उस दौरान वहां मौजूद पुलिसकर्मियों पर मूकदर्शक बने रहने के आरोप लगाये गये थे। सन् 2024 में रामनवमी उत्सव के दौरान मुर्शीदाबाद के शक्तिपुर क्षेत्र में हिंसा भडकी थी। जुलूस पर छतों से पत्थरों के प्रहार किये गये थे। बंगाल का नार्थ 24 परगना, कोलकता, हावडा, साउथ 24 परगना, मालदा, मुर्शीदाबाद जैसे अनेक जिले मुस्लिम बाहुल्य हो गये हैं।
गैर मुसलमानों को निरंतर प्रताडित किया जा रहा हैं। ‘फैक्ट फाइंडिंग टीम’ की रिपार्ट के अनुसार पश्चिमी बंगाल में बंगलादेशी, रोहिग्या सहित अनेक विदेशी घुसपैठिये भारी संख्या में मौजूद हैं जिन्हें फर्जी दस्तावेजों के सहारे भारतीय नागरिक घोषित कराया गया है।
आये दिन होने वाली हिंसक घटनाओं से भय और असुरक्षा का वातावरण निर्मित करके क्षेत्र से गैर मुसलमानों को भगाने का सुनियोजित षडयंत्र अब तेज होता जा रहा है। वहां पर एनजीओ, समाज सेवी संस्थाओं, धार्मिक संस्थाओं, समितियों, ट्रस्ट आदि की आड लेकर कट्टरपंथियों की जमातें राजनैतिक दलों के संरक्षण में अपने मंसूबे पूरे करने में जुटीं हैं।
कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में असोमोयेर अलोर बाटी तथा गोल्डन स्टार ग्रुप जैसे संगठन बनाकर राजेश शेख, बशीर शेख, महबूब आलम, कौसर तथा मुस्तकिन जैसे असामाजिक तत्व तृणमूल कांग्रेस के नेता बनकर सरकारी संरक्षण में सिमी, पीएफआई आदि प्रतिबंधित संगठनों के लिए निरंतर काम कर रहे हैं। ब्लड डोनेशन कैम्प, कल्याणकारी योजना, लाचारों की सहायता, जरूरतमंदों को सामग्री की आपूर्ति जैसे दिखावटी आयोजनों से कट्टपंथी विचारधारा वालों को चयनित करके उन्हें देशद्रोही अभियान में झौंका जा रहा है।
वर्तमान परिदृश्य के आधार पर कल की तस्वीर बेहद डरावनी प्रतीत हो रही है। अभी तो केवल बानगी ही सामने आये हैं। समूचे देश में सीमापार से चलाये जा रहे खतरनाक षडयंत्रों को यदि समय रहते नस्तनाबूद नहीं किया गया तो आन्तरिक कलह की संभावना बढते समय के साथ बलवती होती चली जायेगी। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

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