अर्जुन देशप्रेमी
बिहार में अक्टूबर-नवम्बर में चुनाव होने हैं। इस बीच चुनाव आयोग ने सघन मतदाता पुनरीक्षण अभियान चलाना आरम्भ किया जिसे लेकर विपक्ष की तरफ से भारी विरोध और हो-हल्ला मचाया जा रहा है। इसे लेकर अबतक जो कुछ देखने में आ रहा है, उसमे ऐसा लगता है कि कहीं विपक्ष अपने ही जाल में तो नहीं उलझ गया है। या भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने उसे फंसा दिया है। हो ये रहा है कि विपक्ष जितना इस मुद्दे को उठा रहा है, सनातनी वोट उतना ही सत्तापक्ष की ओर मुड़ता दिख रहा है। सनातनी के मन में यह बात बैठ रही है कि विपक्ष को सिर्फ मुसलमानों, बांग्लादेशियों, रोहिंगियाओं के वोट की चिंता है। तेजस्वी, राहुल गाँधी इनके वोटों के लिए लड़ रहे हैं, पर इनको सनातनियों की कोई चिंता नहीं है। ऐसे में जैसे महाराष्ट्र में चुनावों से पहले इंडी गठवंधन को लग रहा था कि वह आसानी से चुनाव जीत जायेगा, पर हुआ इसका उल्टा। विपक्ष का वहां सफाया जैसा हो गया जिसकी टीस आज भी राहुल गाँधी को उठती रहती है और जिसके लिए वह चुनाव आयोग पर हार का ठिकड़ा फोड़ते रहते हैं। पर क्या इस बार बिहार में कुछ ऐसा ही तो नहीं होने जा रहा है जिसका भान विपक्ष को हो नहीं पा रहा है, या उसे अभी से इसका भान हो गया है और वह कुछ कर नहीं पा रहा है सिवाय हल्ला मचाने के। और यह हल्ला भी उसके विरुद्ध ही तो नहीं जा रहा है। जिस तरह से अभी दोनों ओर से मोर्चाबंदी हो रही है, उसमें अगर लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी, राहुल गाँधी की पार्टी कांग्रेस और उनके सहयोगी दल 50 सीटों से भी नीचे सिमट जायें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए जबकि हाल के दिनों में हुए कई सर्वे उसे बहुमत दिलाते दिख रहे हैं।
हाल ही में अलग-अलग एजेंसियां और मीडिया संस्थान सर्वेक्षण (ओपिनियन पोल) जारी किये हैं। कुछ सर्वेक्षणों के अनुसार, महागठबंधन (राजद, कांग्रेस और लेफ्ट) को बहुमत मिल सकता है, जबकि एनडीए (जदयू-भाजपा गठबंधन) को कुछ सीटों का नुकसान होने का अनुमान है। पोल ट्रैकर के सर्वे के मुताबिक, महागठबंधन को 44.2% वोटों के साथ 126 सीटें मिलने का अनुमान है, जो बहुमत के आंकड़े को पार करता है। वहीं, एनडीए को 112 सीटें मिल सकती हैं। नवभारत टाइम्स के एक सर्वे में भी मुख्यमंत्री पद की पहली पसंद के तौर पर तेजस्वी यादव को आगे दिखाया गया है (3.3% लोगों की पसंद), जबकि नीतीश कुमार 35.6% लोगों की पसंद हैं। इस सर्वे में यह भी सामने आया है कि 51.2% लोगों के लिए बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है। सी-वोटर के अलग-अलग सर्वे में भी तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में सबसे आगे नजर आ रहे हैं। पर ये सारे सर्वे साफ लिख रहे हैं हैं कि चुनाव से पहले ये सिर्फ अनुमान होते हैं और वास्तविक परिणाम कई कारकों पर निर्भर करते हैं।
वर्तमान में वोटर लिस्ट का वेरिफिकेशन चल रहा है, जिससे लगभग 35 लाख नामों के कटने का अनुमान है। दरअसल ये ऐसे लोग हैं जो या तो बांग्लादेशी हैं, या रोहिंगिया या नेपाली जिनके आधार कार्ड फर्जी तरीके से बने हैं। इनमें बड़ी संख्या में वैसे लोग भी हैं जो घुसपैठ करके आते हैं, यहाँ की मतदाता सूचियों में येन केन प्रकारें नाम शामिल कराते हैं और फिर इन पहचान पत्रों के आधार पर देश के दूसरे हिस्सों में जाकर बस जाते हैं। बड़ी संख्या में ऐसे लोग दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, गुजरात आदि में देखे जाते हैं जहाँ अवैध कब्जे कर ये घर बना लेते हैं। पर वोट के समय वे बिहार में पहुंचते हैं और वोट कर देते हैं। इनको उन नेताओं की मदद करनी होती है, जिन्होंने इनको आधार कार्ड, राशन कार्ड या दूसरे पहचान पत्र बनवाने में मदद की होती है। साथ ही इससे इनको दूसरे सरकारी लाभ लेने में भी मदद मिलती है। इसका भी नतीजों पर असर पड़ सकता है। यानि फिलहाल, कोई भी निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि कौन जीतेगा, क्योंकि राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदलता रहता है।
पर इनमें से किसी ने भी इसका आंकलन नहीं किया है कि बिहार में महाराष्ट्र की तर्ज पर ही सनातन धर्मावलम्बी एकजुट हो रहे हैं और उनका ध्रुवीकरण हो रहा है। इसका साफ कारण यह है कि इंडी गठबंधन की तरफ से जिस तरह की बयानबाजी हो रही है, उससे साफ है कि वे फिर से मुस्लिम वोटों पर ही नज़र गड़ाए हुए हैं। न तो ये सनातनी वोटों के लिए कोई बात कर रहे हैं, न ही उनको इनकी चिंता है। वे मानकर चल रहे हैं कि इनका एक बड़ा वर्ग तो इन्हें वोट करेगा ही। खासकर यादव वोट। यादव और मुस्लिम वोटों के जरिये ये सत्ता पा जायेंगे। अगर आप बिहार के गावों में इमानदारी से लोगों का मन टटोलें तो साफ दिखता है कि सनातनी लोग ठीक उसी तरह से गोलबंद हो रहे हैं जिस तरह मुस्लिम लोग। ऐसा मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में साफ दिखा भी है। अब यह बिहार में भी दिख रहा है जिसे विपक्ष के नेता देखना नहीं चाहते हैं। बागेश्वर बाबा की रैली इसकी एक बानगी थी, जिसे देखकर भी विपक्ष अनदेखा कर रहा है।
और ऊपर से तुर्रा यह कि बिहार के वोटर लिस्ट से 35 लाख लोगों के नाम कट रहे हैं, कुल संख्या एक करोड़ से भी ऊपर भी जा सकती है। यह वोट बैंक मना जाता है कि विपक्षी दलों का ही है, खासकर मुसलमानों के वोट। अगर ऐसा हुआ तो लगभग 50 से 60 वैसे सीटों पर विपक्ष का खेल बिगड़ सकता है। और कुल मिलाकर विपक्ष के सत्ता में आने के सपने पर पानी फेर सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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