अर्जुन देशप्रेमी

गाड़ियों की उम्र नहीं, फिटनेस ज्यादा जरूरी

अंततोगत्वा दिल्ली सरकार ने दिल्ली में पुरानी गाड़ियों को तेल न देने और उनको जब्त करने की कार्रवाई को विराम देने के साथ ही अदालत का दरवाजा खटखटाने का निर्णय किया है जिससे दिल्ली में 10 साल से ज्यादा पुरानी डीजल और 15 साल से ज्यादा पुरानी पेट्रोल गािड़यों को डीजल और पेट्रोल मिल सके और उनको जब्त न किया जाये (लोगों को अपनी इन गािड़यों को कबाड़ में न बेचना पड़े, स्क्रैप न कराना पड़े। सरकार का यह निर्णय देखा जाये तो ठीक ही है, पर प्रदूषण का क्या?
क्या इससे दिल्ली में प्रदूषण पर रोक लगाने में समस्या नहीं आएगी? दरअसल दिल्ली में प्रदूषण की बड़ी समस्या रही है। इससे पहले सन 2000 के आसपास तो दिल्ली गैस चैम्बर जैसी बन गई थी। उससे उबारने के लिए आनन फानन में दिल्ली की सभी बसों को डीजल से हटाकर सीएनजी में कन्वर्ट किया गया था।
पर इसके बाद फिर जैसे जैसे दिल्ली बढ़ती गयी, यहाँ कारों, दोपहिया वाहनों के साथ साथ दूसरे वाहनों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि होती गयी। परिणाम यह हुआ कि दिल्ली में एक बार फिर प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुँच रहा है।
सर्दियों में तो बेहद खतरनाक हो जाता है। यह एक बड़ी सच्चाई है कि दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार है। 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली की औसत वार्षिक पीएम 2.5 मात्रा विश्व स्वस्थ्य संगठन गाइडलाइन से करीब 20 गुना ज्यादा है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अनुसार डीज़ल कारें कुल वाहनों का 2% होते हुए भी पीएम 2.5 में 10% योगदान करती हैं। बोर्ड के अनुसार पुरानी गाड़ियाँ नई गाड़ियों की तुलना में कई गुना ज्यादा नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर छोड़ती हैं।
इसी आधार पर 2014 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एन जी टी) ने आदेश दिया कि दिल्ली-एनसीआर में 10 साल से पुरानी डीज़ल गाड़ियाँ और 15 साल से पुरानी पेट्रोल गाड़ियाँ चलाना प्रतिबंधित है। 2018-2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मुहर लगाई और कहा कि इन गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन भी रद्द कर दिया जाएगा।
इसके ऊपर जैसे ही दिल्ली में 1 जुलाई से अमल आरम्भ हुआ, हडकंप सा मच गया। 62 लाख वाहनों पर खतरा आ गया। अब सवाल है कि क्या यह उचित है? क्या इसके पीछे जो तर्क दिया जा रहा है, वह ठीक है? दुनिया के दूसरे देशों में भी प्रदूषण की समस्या है। तो क्या वहां भी ऐसे ही नियम लागू हैं? और नहीं तो फिर किया क्या जाना चाहिए? जर्मनी के कुछ शहरों में पुराने डीज़ल वाहनों को ‘ग्रीन ज़ोन’ में एंट्री से रोका जाता है, पर चलना पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है। फ्रांस के पेरिस में एक ‘क्रिट’ एयर सर्टिफिकेट सिस्टम है जिसके तहत सबसे प्रदूषक गाड़ियों पर हाई ट्रैफिक टाइम यानि पीक ऑवर में रोक है।
लंदन में प्रदूषण फैलाने वाली पुरानी गाड़ियों पर भारी चार्ज लगाया जाता है। चीन के बीजिंग और शंघाई जैसे शहरों में 10–15 साल पुरानी गाड़ियों पर कुछ ज़ोन में एंट्री बैन, पर शहर के बाहर चल सकती हैं। यानि अधिकतर देशों में दिल्ली की तरह सीधा पेट्रोल/डीजल देने पर रोक लगाने जैसा कोई नियम नहीं है। उनको चलाने पर भारी टैक्स, रोड चार्ज या ज़ोनल प्रतिबंध होते हैं।
2021 में भारत सरकार ने वाहन कबाड़ नीति लागू की जिसके तहत 20 साल पुरानी निजी गाड़ियाँ ऑटोमैटेड टेस्ट में फेल होने पर अनफिट घोषित किये जाने का प्रावधान है, पर फिट होने पर गाड़ी चल सकती है। इसके उलट दिल्ली-एनसीआर में एन जी टी का आदेश बेहद सख्त है।
इसके तहत डीज़ल वाहन 10 साल, पेट्रोल वाहन पर 15 साल बाद सीधा प्रतिबंध लग जाता है। किसी टेस्ट या फिटनेस टेस्ट की ज़रूरत ही नहीं। आपकी गाड़ी नयी गाड़ियों से भले ही बेहतर हो, पर वह कबाड़ मान ली जाएगी और जब्त कर ली जाएगी। इसे सुप्रे कोर्ट तक ने जायज बता दिया है।
पर सवाल है कि क्या यह अनुचित नहीं है? देश के ज्यादातर लोगों, खासकर मिडिल क्लास के लिए कार खरीदना एक भावनात्मक पल होता है जिसमे जीवन की बड़ी कमाई पूँजी लगाती है। जीवन में वे एक बार ही गाड़ी खरीद पाते है, या उनकी क्षमता होती है। ऐसे में इस तरह की रोक उनके सपनों पर कुठाराघात करने जैसी है।
शायद कोर्ट और सरकारों ने इस मुद्दे पर पूरी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया कि उम्र से गाड़ी के प्रदूषण का सीधा लेना देना नहीं है। ऐसा देखा गया है कि किसी ने 2 से तीन साल में ही अपनी गाड़ी 2 से 3 लाख किलोमीटर चला दी हो और उसका अस्थि पंजर ढीला हो गया हो। उसने इंजन के रखरखाव पर ध्यान न दिया हो।
प्रॉपर सर्विस न कराई हो। ऐसे में उसकी गाड़ी नई होने पर भी ज्यादा प्रदूषण करेगी। इसके विपरीत यह भी होता है कि किसी कि गाड़ी है तो 10 या 15 साल से ज्यादा पुरानी, पर चली 1 लाख किलोमीटर से भी कम है।
कई लोगों को मई जानता हूँ जिनकी गाड़ी महीने में 300 किलोमीटर से भी कम चलती है। ऐसे में उनकी गाड़ी 15 साल में चली है सिर्फ 54 हजार किलोमीटर। ऐसे लोगों ने अपनी गाडी की प्रॉपर सर्विस करा रखी है। कई तो नयी जैसी दिखती है। जाहिर है ये गाड़ियाँ कम प्रदूषण फैलाएंगी।
इन उदाहरणों से साफ साबित होता है कि सिर्फ उम्र से ज्यादा प्रदूषण फैलाने के कोई लेना देना नहीं है। ऐसे में कोर्ट और सरकारों को चाहिए की वे गािड़यों की समय समय पर जाँच के आधार पर  गाड़ियों को सडकों से हटाने कैसी नीति बनाएं। इसमिन एक नियम यह भी हो सकता है की गाडी कितने किलोमेटे चली है और उसका रखरखाव का इतिहास क्या है? इसके बाद फिटनेस को परखा जाये और फिर उनपर रोक लगाने के नियम बनाए जायें। इसके साथ ही इंधन की गुणवत्ता पर जोर दिया जाये।
दिल्ली और एनसीआर में पेट्रोल और डीजल की नयी गािड़यों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया जाये। दिल्ली में सिर्फ सीएनजी, हाइड्रोजन या इलेक्ट्रिक गािड़यों की ही बिक्री हो।
ऐसा करने से अगले कुछ वर्षों में डीजल और पेट्रोल वाहनों की संख्या निरंतर कम होती जाएगी और समस्या अपने आप सुलझ जाएगी, प्रदूषण पर नियंत्रण आसन हो जायेगा। साथ बाहर से आनेवाली पुरानी गािड़यों की पहचान कर उनको शहर में प्रवेश न करने दिया जाये।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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