फर्जी मतदाताओं के मुद्दे पर गुनाहगार तो भाजपा-जदयू है
अर्जुन देशप्रेमी
चुनाव आयोग द्वारा बिहार में मतदाता सूची के सघन परीक्षण के मामले को लेकर आजकल बवाल सभा मचा हुआ है। विपक्ष कह रहा है कि यह होना ही नहीं चाहिए तो सत्तापक्ष कह रहा है यह बिल्कुल उचित है। इन सबके बीच में बहुत सारी बातें सामने आई है जिनके अनुसार जितनी जनसंख्या नहीं है, उससे ज्यादा तो लोगों के पास आधार कार्ड और दूसरे अन्य पहचान पत्र आ गए हैं। कुछ जिलों में तो लगभग 25 से 30 प्रतिशत फर्जी वोटर हैं। बहुत सारे मुसलमान 4-4, 5-5 जगह से वोटर बन गए हैं। कई मुसलमान कई राज्यों में भी वोटर बने हुए हैं। अगर सामने आ रहे आंकड़ों की मानें तो किशनगंज में 100 लोगों पर 126 लोगों के आधार बने हुए हैं। वहां 68% मुस्लिम आवादी है। इसी तरह कटिहार में 123% आधार कार्ड बन गए हैं। वहां मुस्लिम आबादी 44% है। अररिया में 123% आधार कार्ड बने हैं। वहां 43% मुस्लिम आबादी है। पूर्णिया में 121%लोगों के आधार कार्ड हैं। वहां 38% मुस्लिम आबादी है। इसके उलट जहाँ हिन्दू आबादी है वहां 100 प्रतिशत आधार कार्ड भी नहीं बनें हैं। बिहार में औसत आधार कार्ड 94% बने हैं। अब कल्पना कीजिए, बंगाल का क्या हाल होगा।
पर अब सवाल है कि आखिर यह संभव कैसे हुआ है? आबादी से 26 प्रतिशत ज्यादा लोगों के आधार कार्ड बने कैसे? और यह सब उन्हीं जिलों में क्यों हुआ जहाँ मुस्लिम आबादी ज्यादा है और जो बांग्लादेश के पास है। मूल सवाल तो यह है और इस पर कोई बहस करने को तैयार नहीं है। विपक्ष को सवाल यह उठाना चाहिए था कि इतने आधार कार्ड आखिर बने कैसे? यह तो सरकार की असफलता है। बिहार में तो लम्बे समय से भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड की सरकारें रही हैं। बेच में तोड़े समय के लिए जदयू और लालू प्रसाद की पार्टी आरजेडी की सरकार रही है। ऐसे में सवाल तो यह बनता है कि आखिर भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड की सरकार इतनी निकम्मी कैसे निकली कि इसके शासनकाल में 126% तक से ज्यादा आधार कार्ड कई जिलों में बन गए।अब अब यह बात भी सामने आ रही है कि इनमें लाखों की संख्या में ऐसे लोगों के आधार कार्ड बने हैं जो भारत के हैं ही नहीं। या तो वह बांग्लादेश के हैं या नेपाल के हैं या फिर म्यांमार के हैं।
भारतीय जनता पार्टी और नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड बिहार के में पिछले 20 वर्षों में से लगभग 16 से 17 साल सत्ता में रही है। ऐसे में यदि 2003 के बाद से इतनी भारी संख्या में बोगस आधार कार्ड बने हैं तो यह पूरी तरह से भाजपा-जदयू की विफलता है। यही पार्टियाँ कहती रही है कि वह भारत से बांग्लादेशियों को बाहर कर देगी। पर यह कैसा शासन है कि जो पार्टी ऐसा कहती रही है उसी के शासन में इतनी बड़ी संख्या में फर्जी आधार कार्ड बन गए हैं और मतदाता सूची में इनके नाम आ गए हैं। ऐसे लोग मतदान भी कर रहे हैं जो पूरी तरह असंवैधानिक है। ऐसे लोग भारत के संसाधनों पर अपना हक जता रहे हैं, उसकी लूट मचा रखी है।
आखिर कैसा शासन रहा है नीतीश कुमार का और जनता भारतीय जनता पार्टी का जो इस पर भी लगाम नहीं लगा पाई। ऐसी सरकार से तो विपक्ष को इस्तीफा मांगना चाहिए। ऐसे लोगों को देश से बाहर करने के लिए विपक्ष को दबाव बनाना चाहिए। पर विपक्ष यह कहने में लगा है कि ऐसे लोगों को मतदान का अधिकार मिलना चाहिए। यह कैसा विपक्ष है।
सत्ता पक्ष भी इसी में अपना फायदा देख रहा है। यह बताने कि जगह की उनके शासन में ऐसा कैसे हुआ, वह यह कहने में लगा है कि ऐसे पहचान पत्र आधार कार्ड पता नहीं कैसे बन गए। इसके लिए वह कार्य विपक्ष को दोष दे रहा है। पर सरकार को यह जवाब देना पड़ेगा कि आखिर सरकारी तंत्र ने इतनी बड़ी संख्या में आधार कार्ड बना कैसे दिया? क्या बिहार सरकार और उसका पूरा प्रशासन फेल रहा? अगर अधिकारियों ने मनमानी की तो सरकार ने उनके खिलाफ क्या कदम उठाए? अगर कर्मचारियों ने गलती की तो अधिकारियों ने उनके खिलाफ क्या कदम उठाए? अगर किसी ने मिली भगत की, वह भी 23 वर्षों तक लगातार, तो आखिर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई? एक दिन में तो यह काम हुआ नहीं होगा।
अगर विपक्ष के लोगों ने ऐसे गलत काम कराये तो फिर सरकार ने उनको जेल में क्यों नहीं ठूंसा। अगर ऐसे लोग जिनके आधार कार्ड बन गए तो भाजपा और जदयू की सरकार में इन लोगों की पहचान क्यों नहीं की। इनको बिहार और देश से बाहर क्यों नहीं भेजा? इनको जेल में क्यों नहीं डाला? क्या यह संभव है कि सरकार ना चाहे, प्रशासन ना चाहे तो इतनी बड़ी संख्या में फर्जी आधार कार्ड बन सकते हैं?
मेरे हिसाब से तो बिल्कुल नहीं। ऐसे में बिहार की जदयू और भारतीय जनता पार्टी की सरकार सीधे तौर पर दोषी है, गुनाहगार है। और उसे इसके लिए देश से माफी मांगनी चाहिए। विपक्ष को मूल मुद्दा इसे बनाना चाहिए ना कि चुनाव आयोग द्वारा किए जा रहे सघन मतदाता प्रशिक्षण अभियान के खिलाफ मुद्दा उठाना चाहिए। पर ऐसा लगता है कि विपक्ष को अपने मुस्लिम वोटो की ही चिंता है और उसे देश की कोई चिंता नहीं है। विपक्ष पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने फायदे के लिए एक ऐसे मुद्दे पर उलझे हुए हैं जो मूल मुद्दा है ही नहीं। दोनों ही मूल मुद्दे की तरफ बहस करने को तैयार नहीं है। अगर यही रवैया देश की राजनीतिक पार्टियों का रहा तो आने वाले समय में देश में इससे भी बड़ी समस्याएं खड़ी होगी जिसके लिए जिसका सुधार बहुत ही मुश्किल होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)