अर्जुन देशप्रेमी
चीन भारत को लेकर बार बार रंग बदलता रहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की तरह यू टर्न भी लेता है। शांति की बात करते-करते युद्ध में हमारे खिलाफ हमारे दुश्मन को हर तरह की मदद देता है। कूटनीति में हमारे खिलाफ साजिशें रचता है।
शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) जैसे एक मंच पर हमारे खिलाफ पाकिस्तान की तरफदारी करता है जिसके कारण भारत संयुक्त घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने से मना कर देता है, तो दूसरी तरफ ब्रिक्स जैसे मंच पर हमारी बातों पर सहमति जताकर घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर भी करता है। गाहे-बगाहे सीमा पर हलचल करता है और फिर शांति की बात करने लगता है।

चीन के साथ भारत के सम्बन्ध हमेशा से ही खटास भरे रहे हैं। जिस तरह से उसने भारत को बार-बार धोखा दिया है, उससे भारत के साथ वैसे भी उसके सम्बन्ध मधुर होने की गुंजाईश नहीं दिखती है, पर सामान्य होने की आशा की जाती रही है।
ब्राजील में ब्रिक्स शिखर सम्मलेन में जिस तरह से चीन ने घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किये हैं, वह हैरान करने वाला तो है ही, चीन के दोगलेपन को भी दर्शाता है। इससे समझ नहीं आ रहा है कि चीन किस दिशा में जा रहा है या कब क्या करेगा। ब्रिक्स में आतंकवाद पर सभी देश एक साथ आए हैं।
शिखर सम्मलेन के घोषणा पत्र में भारत में पाकिस्तान की ओर से हुए आतंकी हमले की निंदा की गई है, जिसका सीधा मतलब है कि वे मानते हैं कि इस हमले में पाकिस्तान का सीधा हाथ है। ये घोषणा पत्र खास इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये पाकिस्तान के जिगरी दोस्त बने चीन की उपस्थिति में तैयार किया गया है।
ब्रिक्स देशों में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका शामिल हैं। इसके बढ़े हुए स्वरूप में कुछ और देश भी शामिल हुए हैं और सबने मिलकर सम्मेलन के घोषणा पत्र में पहलगाम हमले का जिक्र करते हुए इसे क्रूर आतंकवादी घटना कहा है। इसमें जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा की गई है। इस हमले में 26 निर्दोष लोगों की जान गई थी और कई लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए थे।
घोषणापत्र में इस हमले का जिक्र करते हुए इसे ‘आतंकवाद की क्रूर और अमानवीय कार्रवाई’ बताया गया है। पूरे घोषणापत्र में पाकिस्तान का नाम सीधे तौर पर कहीं नहीं है लेकिन सीमा-पार आतंकवादियों की आवाजाही और आतंक की सुरक्षित पनाहगार और आतंकियों को आर्थिक सहयोग जैसे शब्दों का जिक्र जरूर किया गया है। इन शब्दों का सीधा इशारा पाकिस्तान की ओर ही है। घोषणा पत्र में वैश्विक मंच पर बिना टकराव के आतंक के केंद्र की ओर सभी देशों का ध्यान खींचा गया है। घोषणापत्र में आतंकवाद को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया गया है। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आतंकवाद को किसी भी धर्म, नस्ल या नागरिकता से जोड़ना पूरी तरह अनुचित है। इसके साथ ही सभी सदस्य देशों ने आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर सहमति जताई और जोर दिया कि अब आतंकवाद से निपटने में दोहरे मापदंड अब स्वीकार नहीं किए जाएंगे।
चीन अभी कुछ ही समय पहले पाकिस्तान के हक में ये कहकर खड़ा रहा कि वो आतंकवाद का पीड़ित है। चीन में शंघाई सहयोग संगठन यानि एससीओ की बैठक में तो चीन ने पकिस्तान के साथ मिलकर पहलगाम हमले पर एक भी शब्द नहीं लिखा था। पर इसके उलट उसने बलूचिस्तान में आतंकवाद की निंदा करने की बात जोड़ दी थी और उसमे सीमा पर से आतंकवाद को बढ़ावा दिए जाने की बात जोड़ दी थी जिसका मतलब यह था।

भारत बलूचिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है और पकिस्तान आतंकवाद से पीड़ित देश है। वह तो गनीमत थी कि भारतीय पक्ष ने इसे समय रहते देख लिया और संयुक्त घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया जिससे वह जारी ही नहीं हो सका। यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि इस बैठक में भारत के सबसे भरोसेमंद दोस्त में शुमार किया जाने वाला रूस भी चीन की तरफ दिख रहा था।
अब चीन की मौजूदगी में संयुक्त घोषणा पत्र जारी होने का मतलब है कि चीन ने अपना रुख बदला और वो भी इस बात को मान रहा है कि पहलगाम में जो कुछ हुआ, वो आतंकी साजिश था। तो आखिर इतने छोटे से अन्तराल में ऐसा क्या हो गया कि चीन ने अपना रूख ही बदल लिया।
पर इसके ठीक बाद अब उसने एक नया बखेड़ा खड़ा करना आरम्भ किया है और वह है दलाईलामा का उत्तराधिकारी की नियुक्ति। अब दलाई लामा के उत्तराधिकार को लेकर चीन जिस तरह दखल दे रहा है, उससे भारत-चीन संबंधों में नई तल्खी आने की आशंका है। दलाई लामा के जीवन के 90 साल पूरे होने के साथ भारत-चीन के नाजुक संबंधों के बीच उत्तराधिकार का मुद्दा अहम हो गया है।
उत्तराधिकार का सवाल बीजिंग के लिए लंबे समय से एक संवेदनशील विषय रहा है, जो तिब्बती बौद्ध धर्म पर नियंत्रण स्थापित करना चाहता है। 1959 में तिब्बत से भागे दलाई लामा को शरण देने के भारत के फैसले के लिए वह नाराज है। उसने तिब्बती धार्मिक नेता को ‘विभाजनकारी’ करार दिया है।
दलाई लामा अपनी संत जैसी छवि और शांति के संदेश के साथ और हॉलीवुड की मशहूर हस्तियों और वैश्विक सांस्कृतिक अभिजात वर्ग के सदस्यों सहित उनके अनुयायियों के कारण चीन के लिए कांटा बन गए हैं। इस मुद्दे को लेकर चीन अब हमलावर हो रहा है। यानि बार बार गिरगिट की तरह रंग बदल रहा है। ऐसे में उसका बार बार बदलता रूख भारत के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। इसपर सरकार को कड़ी नज़र रखने की जरूरत है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *