अर्जुन देशप्रेमी
भारत के कानून क्या अंग्रेजों के लिए बनाये गए हैं? क्या जिस देश में मात्र 0.02 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा अंग्रेजी हो, कानून उनके लिए होना चाहिए और उनकी ही भाषा में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही होनी चाहिए? या जिन 46.63 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा (हिंदी) हो और जिसे देश के लगभग 80 प्रतिशत लोग बोल और समझ लेते हों, उसको हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में अपनाया जाना चाहिए? ज्यादातर मराठी, गुजराती, राजस्थानी, भोजपुरी, मगही, मैथिलि, अवधी, हरीयाणवी, उर्दू, पंजाबी, कश्मीरी, तेलुगु, संस्कृत, कन्नड़ बंगाली, मणिपुरी जैसी मातृभाषा वाले भी हिंदी आसानी से सीख, बोल और पढ़ लेते हैं। कायदे से यह संपर्क भाषा भी है। यह प्रश्न एक बार फिर इसलिए सामने आया है क्योंकि उत्तराखंड जैसे हिंदी भाषी राज्य के हाई कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदी पर फिर सवाल उठा दिया है। उनका मत है कि जिसको अंग्रेजी नहीं आती, वह अधिकारी के पद पर काम कैसे कर सकता है? क्या वह अधिकारी के पद के योग्य है? ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट अंग्रेजों के लिए बने हैं?
दरअसल उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बीती 18 जुलाई को नैनीताल के बुधलाकोट ग्राम सभा की वोटर लिस्ट में बाहरी लोगों के नाम शामिल करने को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। पेशी के दौरान उत्तराखंड हाईकोर्ट ने निर्वाचन आयोग से जो सवाल पूछे थे, उसके जवाब हिंदी में दिया गया, जिस पर कोर्ट ने एडीएम स्तर के एक अधिकारी पर अंग्रेजी की जानकारी नहीं होने पर सवाल उठाया है। कोर्ट ने कहा कि जिसे अंग्रेजी का ज्ञान नहीं है, क्या वो अधिकारी किसी कार्यकारी पद को प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सकता है। कैसे वो उच्च न्यायालय के आदेशों का अनुपालन करते हैं, जब अंग्रेजी भाषा का ज्ञान नहीं है। कोर्ट ने उनसे जो सवाल अंग्रेजी में पूछे वो उसका उत्तर हिंदी में देते रहे। जिस पर कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट के सामने पेश हुए एक एडीएम विवेक राय ने कहा कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती है, पर वे समझ लेते हैं। लेकिन बोलने में उन्हें परेशानी होती है। यानि ऐसा भी नहीं है कि उनको अंग्रेजी नहीं आती है। पर कोर्ट तो कोर्ट है।
हाई कोर्ट की इस टिप्पणी पर हिंदी और देश के कानूनों, अदालतों में देशी भाषाओं की दुर्गति पर नए सिरे से बहस छिड़ चुकी है और इसपर व्यापक चर्चा के बाद उचित कदम उठाये जाने की जरूरत है। अदालतें आम लोगों के लिए हैं, न कि अंग्रेजी दा गिने चुने लोगों के लिए। फिर आज़ादी के लगभग 8 दशक बाद भी ऐसा क्यों हो रहा है कि उच्च अदालतें उसी भाषा को अपना रही हैं जिसे लोग समझते ही नहीं हैं और जिसके लिए उनको दूसरों का मुंह देखना पड़ता है। बिना अंग्रेजी दा वकील के वे उच्च अदालतों में न अपनी बात रख पाते हैं, न ही वहां क्या हो रहा है, क्या बोला जा रहा है, क्या फैसला हो रहा है, समझ पाते हैं।
हालांकि ऐसा भी नहीं हैं कि हिंदी को सिरे से खारिज कर दिया गया है। चार उच्च न्यायालय, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार, अपनी कार्यवाही और कानूनी दस्तावेजों में हिंदी का उपयोग करने की अनुमति देते हैं। संविधान के अनुच्छेद 348(2) के अनुसार, राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उच्च न्यायालय में हिंदी या राज्य की आधिकारिक भाषा के उपयोग को अधिकृत कर सकता है। और जब ऐसा है तो फिर सभी हाई कोर्ट्स में ऐसा क्यों नहीं है? खासकर हिंदी भाषी राज्यों में जिसमे उत्तराखंड भी शामिल है, उसमे हिंदी क्यों नहीं?
एक मजेदार किस्सा याद आता है जब पटना हाई कोर्ट में एक वकील साहब हिंदी बोलते रहे और जज साहब उनसे अंग्रेजी बोलने या अंग्रेजी में अनुवाद देने के लिए कहते रहे। जज साहब का कहना था कि उनको हिंदी नहीं आती। वकील साहब का भी कहना था कि उनको अंग्रेजी नहीं आती। और मामला यहीं घुमने लगा। आजकल लाइव स्ट्रीमिंग के कारण यह पूरा वाकया लोग देखते रहे। कई अन्य अवसरों पर भी हिंदी को लेकर जजों के पूर्वाग्रह दिखते हैं।
जहाँ तक संविधान की बात है, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों का प्रश्न है, भारत के संविधान के अनुच्छेद 348(1)(ए) में कहा गया है कि इन न्यायालयों में सभी कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में होगी। हालांकि, भारत के संविधान के अनुच्छेद 348 (2) में इस बात का प्रावधान है कि किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उस राज्य में स्थित उच्च न्यायालय के प्रधान पीठ की कार्यवाही में हिंदी भाषा या उस राज्य के किसी भी आधिकारिक प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किसी अन्य भाषा के उपयोग को अधिकृत कर सकता है। इसके अलावा, राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 7 में कहा गया है कि किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उस राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा पारित या किए गए किसी भी निर्णय, डिक्री या आदेश के लिए अंग्रेजी भाषा के अलावा, हिंदी या राज्य की आधिकारिक भाषा के उपयोग को अधिकृत कर सकता है। और जहां कोई भी निर्णय, डिक्री या आदेश किसी ऐसी भाषा (अंग्रेजी भाषा के अलावा) में पारित या दिया जाता है, तो उसके साथ उच्च न्यायालय के अधिकार के तहत जारी अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद भी संलग्न होना चाहिए। केंद्रीय मंत्रिमंडलीय समिति के दिनांक 21 मई 1965 के निर्णय में यह कहा गया है कि उच्च न्यायालय में अंग्रेजी के अलावा किसी अन्य भाषा के उपयोग से संबंधित किसी भी प्रस्ताव पर भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश की सहमति प्राप्त की जाएगी। राजस्थान के उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिंदी का उपयोग 1950 में संविधान के अनुच्छेद 348 (2) के तहत अधिकृत भी किया गया था। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, मंत्रिमंडलीय समिति के दिनांक 21 मई 1965 के निर्णय के बाद, भारत के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से उत्तर प्रदेश (1969), मध्य प्रदेश (1971) और बिहार (1972) के उच्च न्यायालयों में हिंदी का उपयोग अधिकृत किया गया था।
पर अफ़सोस इस बात का है कि उच्च और सर्वोच्च न्यायालयों में हिंदी आज भी उपेक्षि है। आज भी अंग्रेजी ही राज कर रही है। क्षेत्रीय भाषाओं की तो बात ही कौन करे। आज भी देश में हिंदी के लिए 2 दबाना पड़ता है। अदालत भी यही कहती है कि अंग्रेजी नहीं बोल पाने वाला आदमी अधिकारी नहीं बन सकता। हिंदी वाले की हिम्मत कैसे हुई अधिकारी बनने की? वह भी हिंदी भाषी प्रदेश में। क्या हिंदी पट्टी में भी हिंदी वाले दोयम दर्जे के ही रहेंगे?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)