अर्जुन देशप्रेमी
क्या अमेरिका का आर्थिक पतन आरंभ हो गया है? एक समय था जब अमेरिका के सामने कोई भी सिर उठाने को तैयार नहीं था। सब उसकी बातों को मान रहे थे। पर जिस तरह से ट्रंप ने हाल फिलहाल में टैरिफ वॉर को आरंभ किया है उसके बाद देखने में आया है कि एक के बाद एक पांच से ज्यादा बड़े देश ट्रंप के सामने सिर्फ उठकर खड़े हो गए हैं और ट्रंप को आईना भी दिखा रहे हैं जिनके पास 60 प्रतिशत बाज़ार है।
ट्रम्प यानि अमेरिका चाहे जितना टैरिफ लगा दें, इनमें से कोई भी देश अमेरिका के आगे झुकता हुआ नहीं दिख रहा है जिनमे भारत भी एक है। अन्य देशों में रूस, चीन, ब्राजील, कनाडा जैसे देश शामिल हैं। जो संकेत मिल रहे हैं उससे ऐसा लग रहा है कि कई अन्य देश भी जल्दी ही इसमे शामिल हो जायेंगे। यूरोप के तो कुछ देश ऐसे भी हैं जो अमेरिका की नीतियों से दुखी होकर नाटो से ही अलग होने की बात कर रहे हैं।
अगर कुछ और देश नाटो से बाहर निकलते हैं तो अमेरिकी दादागिरी कम होगी। कुल मिलाकर अगर जो देश ट्रंप के तारीफ से दुखी हैं, वह मिलकर एक नया गठजोड़ करेंगे, तो यह अमेरिका के लिए आर्थिक रूप से समस्या होगी। संभव है ब्रिक्स और बड़े स्वरुप में सामने आ जाये जो अमेरिका के लिए खतरे की घंटी बन सकता है। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बड़ी चोट पहुंचेगी। इस बीच सच यह भी है कि अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज करीब 37 ट्रिलियन डॉलर यानी करीब 32 लाख अरब रुपये को पार कर गया है। अमेरिका को सबसे ज्यादा कर्ज जापान ने दिया है।
जुलाई 2024 के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका के प्रत्येक नागरिक पर 1,04,507 डॉलर का कर्ज है। हालत यह हो गई है कि अमेरिका को रोज करीब दो अरब डॉलर ब्याज के भुगतान में खर्च करने पड़ रहे हैं। अगले दशक तक यह कर्ज 54 अरब डॉलर पहुंचने का अनुमान है।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) की सदस्य शामिका रवि की माने तो अमेरिका की तरफ से टैरिफ में किसी भी तरह की वृद्धि का बोझ कम आय वाले अमेरिकी परिवारों पर पड़ेगा। वहां महंगाई तेजी से बढ़ेगी जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए घातक होगी। तो क्या यह माना जाए कि ट्रंप जाने अनजाने में अमेरिका को ही आर्थिक पतन की ओर ले जाने के कदम उठा रहे हैं? ऐसे में आखिर होगा क्या? क्या कई देशों पर लगाए गए टैरिफ से अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज चुकाएंगे ट्रंप?
हाल के महीनों में जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने व्यवहार किया है, बयान दिए हैं, उससे उनकी विश्वसनीयता पूरी दुनिया में तो घटी ही है, अमेरिका में भी वे अलोकप्रिय होते जा रहे हैं। जो अमेरिका के दोस्त देश माने जा रहे थे, वह भी ट्रम्प के कारण अमेरिका से दूर होते जा रहे हैं। जिस चीन से लड़ने के लिए भारत को ट्रम्प ने दोस्त माना, उसे ही नाराज़ कर बैठे हैं।
उनके पास सच्चे सवालों के जवाब नहीं हैं और वह कह देते हैं कि उनको नहीं मालूम कि अमेरिका रूस से क्या व्यापार कर रहा है, वह इसकी जाँच कराएँगे। ऐसा कहने के 24 घंटे के भीतर वह भारत पर टैरिफ 25 से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर देते हैं। इसे और बढाने के संकेत ही नहीं धमकी भी देते हैं। ऐसे में भारत करे तो क्या करे। ट्रम्प को किसी कि नहीं सुननी है।
जब जो मन में आये करना है। दुनिया के ज्यादातर देशों पर मनमाफिक टैरिफ लगा दी है। उनको लगता है कि इसी से मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) होगा।
ऐसे में भारत और दूसरे देश जिनकी अमेरिकी से कोई अदावत नहीं थी, करें तो क्या करें? अब तो उनकी मजबूरी है कि वे अमेरिका विरोधी गुट में शामिल हों या, अमेरिका से दूरी बना लें, भले ही उनका नुकसान ही क्यों न हो। अगर वे अमेरिका से दूरी बनाते हैं, तो भी अमेरिका का ही नुकसान होना है, और रूस या चीन के खेमे में जाते हैं, ब्रिक्स जैसे संगठन में जाते हैं, तो भी अमेरिका को ही नुकसान होगा।
सच यह है कि ट्रंप का टैरिफ वास्तव में वैश्विक बाजारों में उपलब्ध सस्ते सामानों पर एक कर है, जिसका बोझ कम आय वाले अमेरिकी परिवारों पर पड़ेगा। उदाहरण के तौर पर भारत से बड़े पैमाने पर फ़ार्मा की सप्लाई होती है और इस टैरिफ़ के बाद भारतीय दवाओं के दाम डेढ़ गुने अधिक हो जाएँगे। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह टैरिफ़ भारत सरकार या उन कंपनियों को नहीं देना है बल्कि अमेरिका की जनता को देना है।
सच यह भी है कि इससे निजात पाने के लिए न तो रातों रात अमेरिका में इतनी फैक्टरियां खुल जायेंगी कि वे अमेरिकियों को सस्ते दाम पर जरूरी प्रोडक्ट दे सकें, न ही वहां श्रम इतना सस्ता हो सकता है जो ऐसा संभव कर दिखाए। भारत, ब्राजील और चीन जैसे देशों को छोड़कर दूसरे किसी देश के पास इतनी क्षमता नहीं है कि वह अमेरिका को हाल फिलहाल पर्याप्त मात्रा में जरूरी सप्लाई दे सके। तो जाहिर है कि वहां उत्पादों की किल्लत होगी जिसका खामियाजा आम अमेरिकियों को भुगतना पड़ेगा जो अमेरिका की अर्थव्यवस्था को कमजोर करेगी।
अमेरिकी टैरिफ को लेकर दुनियाभर के देश किस कदर लामबंद हो रहे हैं, उसका अंदाज़ा टैरिफ को लेकर मचे घमासान के बीच ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने डोनाल्ड के बयान से देखा जा सकता है जिन्होंने यहाँ तक कह दिया कि वह ट्रंप से बात नहीं करेंगे, उसकी जगह वह भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति से बात करेंगे।
भारत ने भी कूटनीतिक मर्यादा के तहत चुप्पी रखने के बाद अब जवाब देना आरम्भ कर दिया है। चीन पहले से ही जवाब दे रहा है। रूस से तो अमेरिका का छत्तीस का आंकड़ा है ही। ट्रंप भारत के साथ जो कर रहे हैं उसका झटका भारत आसानी से झेल लेगा। देर सबेर अमेरिका ही एक बार फिर से झुकेगा। अगर ट्रम्प वास्तविकता को समझने में देर लगाते हैं तो जितनी देर होगी, अमेरिका उतना ही कमजोर होगा। ऐसा ही उसे कई अन्य देशों के मामलों में भी करना पड़ेगा जो अमेरिका को आर्थिक रूप से और कमजोर करने का काम करेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)