PM at Shri Ram Janmbhoomi Mandir Dhwajarohan Utsav, in Ayodhya, Uttar Pradesh on November 25, 2025.

संजय कुमार शर्मा

अयोध्या में राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आस्था, लंबे सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष और राष्ट्रीय भावना का प्रतीक है। ऐसे में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पहले मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति स्वाभाविक रूप से एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय है। करीब 5,585 आवेदनों, कई स्तरों की छंटनी और अंतिम चरण में उम्मीदवारों के चयन के बाद उनके नाम पर मुहर लगना इस पद की अहमियत और चयन प्रक्रिया की व्यापकता को दर्शाता है।
लेकिन इस नियुक्ति के साथ एक बड़ा सवाल भी उठता है—क्या देश के सबसे चर्चित धार्मिक ट्रस्ट की प्रशासनिक व्यवस्था वास्तव में पेशेवर, स्वतंत्र और पारदर्शी बनेगी, या फिर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सत्ता और प्रभावशाली राजनीतिक-सामाजिक हलकों के करीब माने जाने वाले लोगों के हाथों में केंद्रित होती चली जाएंगी? यह प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष की योग्यता पर संदेह नहीं, बल्कि संस्थाओं की स्वायत्तता और जवाबदेही से जुड़ा हुआ है।
एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा का लंबा सैन्य अनुभव निश्चित रूप से उनके पक्ष में जाता है। भारतीय वायुसेना में लंबे समय तक सेवा देने और महत्वपूर्ण कमान संभालने का अनुभव उन्हें प्रशासनिक जिम्मेदारियों के लिए सक्षम बनाता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान वेस्टर्न एयर कमांड से जुड़ी उनकी भूमिका और लगभग चार दशकों का सैन्य अनुभव उनके चयन के पक्ष में मजबूत आधार माना जा सकता है।
राम मंदिर अब केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं रह गया है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु अयोध्या पहुंच रहे हैं। मंदिर परिसर की सुरक्षा, श्रद्धालुओं की सुविधाएं, दान की व्यवस्था, कर्मचारियों का प्रबंधन, निर्माण और भविष्य की परियोजनाएं—ये सभी ऐसे कार्य हैं जिनके लिए आधुनिक और पेशेवर प्रशासन की आवश्यकता है। इसलिए पहली बार पूर्णकालिक सीईओ की नियुक्ति को सिद्धांततः एक सकारात्मक कदम माना जाना चाहिए। मगर किसी भी धार्मिक संस्था की सबसे बड़ी ताकत केवल उसके पदाधिकारियों की प्रशासनिक क्षमता नहीं होती, बल्कि जनता का विश्वास होता है। हाल के समय में मंदिर से जुड़े दान और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों ने ट्रस्ट की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।
इसी पृष्ठभूमि में प्रशासनिक ढांचे में बदलाव किए गए और नए सीईओ की नियुक्ति को प्रबंधन तथा वित्तीय जवाबदेही मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
यहीं से असली परीक्षा शुरू होती है। क्या नया सीईओ दान की एक-एक राशि का पारदर्शी हिसाब सुनिश्चित करेंगे? क्या ट्रस्ट की आय और व्यय से जुड़ी सूचनाएं नियमित रूप से सार्वजनिक होंगी? क्या खरीद, ठेके और निर्माण कार्यों में निष्पक्ष एवं प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अपनाई जाएगी? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या राम मंदिर का प्रशासन किसी राजनीतिक प्रभाव से ऊपर उठकर केवल श्रद्धालुओं और संस्था के हित में काम करेगा?
इस पूरी चयन प्रक्रिया में पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट के सीईओ पद के लिए आवेदन किया था और अपने लंबे प्रशासनिक, सुरक्षा तथा प्रबंधन अनुभव का हवाला दिया था। बाद में उन्होंने चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाते हुए साक्षात्कार के लिए चुने गए उम्मीदवारों के नाम सार्वजनिक करने की मांग भी की थी। इससे यह बहस और तेज हुई कि इतनी प्रतिष्ठित नियुक्ति में अधिकतम पारदर्शिता क्यों आवश्यक है।
आज सत्ता और धार्मिक संस्थाओं के बीच बढ़ती निकटता लोकतंत्र में बहस का विषय है। धार्मिक आस्था का राजनीतिक उपयोग नया नहीं है, लेकिन जब धार्मिक संस्थानों के प्रशासन में प्रभावशाली और सत्ता के निकट माने जाने वाले लोगों की भूमिका बढ़ती है तो निष्पक्षता की धारणा प्रभावित हो सकती है। इसलिए राम मंदिर ट्रस्ट को इस मामले में अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी प्रतिष्ठित पूर्व सैन्य अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपना अपने आप में राजनीतिक नियुक्ति सिद्ध नहीं करता। जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति को उनके अनुभव और योग्यता के आधार पर भी देखा जाना चाहिए। मगर सार्वजनिक संस्थाओं और विशेष रूप से करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े ट्रस्टों में केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं है; उनका निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक है।
करीब साढ़े पांच हजार आवेदनों से शुरू हुई चयन प्रक्रिया का विस्तृत और विश्वसनीय स्वरूप सार्वजनिक होना चाहिए। चयन के मानदंड, उम्मीदवारों के मूल्यांकन की प्रक्रिया और अंतिम निर्णय के आधार को अधिकतम संभव सीमा तक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। इससे नियुक्ति पर उठने वाले राजनीतिक या सामाजिक सवालों का स्वतः जवाब मिल सकेगा। राम मंदिर ट्रस्ट के पहले सीईओ के रूप में जितेंद्र मिश्रा के सामने अवसर भी बड़ा है और चुनौती भी।
वे यदि आधुनिक प्रबंधन, वित्तीय पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही की मजबूत व्यवस्था स्थापित करते हैं तो यह नियुक्ति एक सफल संस्थागत सुधार साबित होगी। लेकिन यदि प्रशासन प्रभावशाली लोगों के हितों और सत्ता समीकरणों के इर्द-गिर्द सीमित होकर रह गया तो इतनी लंबी चयन प्रक्रिया का उद्देश्य भी सवालों के घेरे में आ जाएगा।
राम मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इसलिए उसका संचालन किसी व्यक्ति, संगठन या सत्ता की प्रतिष्ठा का माध्यम नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास की कसौटी होना चाहिए। पहले सीईओ की नियुक्ति के साथ ट्रस्ट को यही संदेश देना होगा कि अयोध्या में राम के नाम पर बनी व्यवस्था का सर्वोच्च सिद्धांत सत्ता के प्रति निकटता नहीं, बल्कि मर्यादा, पारदर्शिता और जवाबदेही है।

लेखक हिंदी दैनिक एनसीआर टुडे, लोक पक्ष, शिक्षा न्यूज एवं वेबपोर्टल खबरियां डॉट कॉम के संपादक हैं

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