संपादक की कलम
भारत आस्था और धार्मिक विश्वासों की भूमि है। देश के करोड़ों लोग मंदिरों, तीर्थस्थलों और धार्मिक आयोजनों में श्रद्धा के साथ पहुंचते हैं। उनके लिए मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि विश्वास, उम्मीद और आध्यात्मिक शांति का केंद्र होता है। लेकिन जब यही आस्था स्थल अव्यवस्था, भीड़ प्रबंधन की कमी और प्रशासनिक लापरवाही के कारण मौत के मैदान में बदल जाएं, तो यह बेहद गंभीर चिंता का विषय है।
सवाल यह है कि आखिर कब तक श्रद्धालु अपनी आस्था की कीमत अपनी जान देकर चुकाते रहेंगे? लखीसराय के अशोकधाम मंदिर में भगदड़ की घटना में सात श्रद्धालुओं की मौत ने एक बार फिर व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे पहले मघड़ा गांव के शीतला माता मंदिर में पूजा के दौरान मची भगदड़ में आठ श्रद्धालुओं की जान चली गई थी। इसी तरह आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के कासिबुगा स्थित वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में एकादशी दर्शन के दौरान रेलिंग टूटने से नौ श्रद्धालुओं की मौत हो गई। अलग-अलग राज्यों में धार्मिक आयोजनों के दौरान होने वाली ऐसी घटनाएं बताती हैं कि हादसों से सबक लेने के बजाय हमारी व्यवस्थाएं अक्सर अगली त्रासदी का इंतजार करती दिखाई देती हैं। इन घटनाओं को केवल ‘भगदड़’ कहकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। भगदड़ अचानक पैदा होने वाली प्राकृतिक आपदा नहीं है। अधिकांश मामलों में इसके पीछे भीड़ का अनुमान लगाने में विफलता, प्रवेश और निकास के सीमित रास्ते, कमजोर बैरिकेडिंग, पर्याप्त पुलिस बल का अभाव, आपातकालीन निकासी की व्यवस्था न होना और आयोजकों तथा प्रशासन के बीच समन्वय की कमी जैसे कारण होते हैं। कई बार धार्मिक संस्थानों के प्रबंधक श्रद्धालुओं की संख्या का सही आकलन किए बिना बड़े आयोजनों की अनुमति दे देते हैं। प्रशासन भी कागजी तैयारियों और औपचारिक निरीक्षण तक सीमित रह जाता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि धार्मिक स्थलों पर आने वाला श्रद्धालु स्वयं को सबसे सुरक्षित महसूस करना चाहता है। वह परिवार, बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं के साथ दर्शन के लिए पहुंचता है। उसे उम्मीद होती है कि मंदिर प्रबंधन और प्रशासन उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। लेकिन जब अचानक भीड़ बढ़ती है, रास्ते बंद हो जाते हैं या बैरिकेड टूट जाते हैं, तब कुछ ही मिनटों में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों में एक व्यक्ति का गिरना कई लोगों की जान का कारण बन सकता है। धार्मिक आयोजनों में भीड़ प्रबंधन को अब सामान्य पुलिस व्यवस्था का हिस्सा मानने के बजाय विशेषज्ञ व्यवस्था के रूप में विकसित करने की जरूरत है।
किसी भी बड़े मंदिर या धार्मिक आयोजन में श्रद्धालुओं की संभावित संख्या का वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए। प्रवेश और निकास के लिए अलग-अलग रास्ते हों। आपातकालीन निकासी के वैकल्पिक मार्ग पहले से तय किए जाएं। बैरिकेडिंग और रेलिंग की तकनीकी जांच हो। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की तैनाती की जाए। सीसीटीवी, सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली और नियंत्रण कक्ष लगातार सक्रिय रहें। इसके साथ ही धार्मिक संस्थानों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। मंदिर प्रबंधन केवल चढ़ावे और व्यवस्थाओं तक सीमित नहीं रह सकता। श्रद्धालुओं की सुरक्षा उसकी पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए। यदि किसी आयोजन में क्षमता से अधिक भीड़ पहुंचती है तो प्रवेश को अस्थायी रूप से रोकने का साहस भी प्रबंधन को दिखाना होगा। वीआईपी दर्शन, विशेष प्रवेश और अन्य व्यवस्थाओं के कारण आम श्रद्धालुओं के आवागमन में बाधा नहीं आनी चाहिए।
प्रशासन की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। किसी बड़े धार्मिक आयोजन की अनुमति देने से पहले सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य किया जाना चाहिए। आयोजन के दौरान भीड़ की वास्तविक स्थिति पर लगातार निगरानी हो। यदि किसी स्थान पर क्षमता से अधिक लोग जमा हो जाएं तो तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था की जाए। हादसा होने के बाद जांच समिति गठित करना पर्याप्त नहीं है। जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए।
यह भी जरूरी है कि श्रद्धालुओं को सुरक्षित व्यवहार के प्रति जागरूक किया जाए। भीड़ में धक्का-मुक्की न करना, निर्धारित मार्गों का पालन करना और आपात स्थिति में अफवाहों से बचना महत्वपूर्ण है। लेकिन श्रद्धालुओं को जिम्मेदार ठहराकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। जिस व्यवस्था में लाखों लोगों को एक स्थान पर बुलाया जाता है, उसकी सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी आयोजकों और प्रशासन की ही होती है। हर ऐसी घटना के बाद कुछ दिनों तक शोक, मुआवजे और जांच की बातें होती हैं। राजनीतिक बयान आते हैं, अधिकारी घटनास्थल का दौरा करते हैं और भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के आश्वासन दिए जाते हैं। लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है और अगली घटना का इंतजार शुरू हो जाता है। यही रवैया सबसे अधिक चिंताजनक है।
आस्था को सुरक्षित वातावरण देना सरकार और धार्मिक संस्थानों दोनों की जिम्मेदारी है। मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ना आस्था की मजबूती का संकेत हो सकता है, लेकिन उस भीड़ को सुरक्षित संभालना प्रशासन की क्षमता की परीक्षा है। विकास और आधुनिक तकनीक के इस दौर में यदि हम मंदिरों में आने वाली भीड़ के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन व्यवस्था नहीं बना सकते, तो यह व्यवस्था की गंभीर विफलता है। श्रद्धालु मंदिर में भगवान के दर्शन करने जाता है, मौत का सामना करने नहीं। उसकी आस्था को सुरक्षा की गारंटी मिलनी चाहिए। अब समय आ गया है कि हर हादसे के बाद संवेदना व्यक्त करने के बजाय हादसे से पहले सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। सवाल केवल यह नहीं है कि अगली दुर्घटना कब होगी, बल्कि सवाल यह है कि क्या अगली दुर्घटना को रोकने के लिए हम अभी से गंभीर कदम उठाएंगे? आस्था के नाम पर लापरवाही को स्वीकार नहीं किया जा सकता। श्रद्धालुओं की जान किसी भी धार्मिक आयोजन से अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए अब व्यवस्थाओं को जवाबदेह बनाना ही होगा, ताकि मंदिरों में घंटियों की आवाज के बीच चीखें सुनाई देने का सिलसिला हमेशा के लिए रुक सके।