अर्जुन देशप्रेमी
बिहार में चुनाव सिर पर हैं। सभी दल मुद्दों को लेकर ताल ठोक रहे हैं। कोई बेरोजगारी की बात कर रहा है तो कोई हिन्दू मुस्लिम की। कोई पलायन की बात कर रहा है तो कोई बिहार के विकास में पिछड़ने की। कोई सरकार के निकम्मेपन की बात कर रहा है तो कोई वंशवादी राजनीति और भ्रष्टाचार की। पर कोई भी दल उस मूल कारण की बात नहीं कर रहा है जिसने बिहार को बर्बाद किया है और जो आज भी बिहार के पिछड़ेपन का मूल और सबसे बड़ा कारण है। यह एक कारण दूसरे सभी कारणों पर भारी था और है। पर न जाने क्यों इसपर न तो पिछले चुनावों में कभी खुलकर बात की गयी, न ही इस बार ऐसा होता दिख रहा है। यह कारण है बिहार में जनसँख्या विस्फोट जिसने न तो विकास के लिए जमीन छोड़ी है, न ही प्रति व्यक्ति इतना संसाधन जिससे विकास को गति दी जा सके। इसी के कारण बिहार से बड़ी संख्या में पलायन आरम्भ हुआ जो अनवरत जारी है।
इस समस्या को एक सच्चे और वास्तविक उदाहरण से समझिये। मैं अपने सिवान जिले में स्थित गाँव की बात कर रहा हूं। बिहार के सिवान जिले के ज्यादातर गांवों और कस्बों, यहाँ तक की शहरों की यही हकीकत है, अपवादों को छोड़कर। मेरे दादा के समय मेरे गाँव के एक व्यक्ति के पास 15 एकड़ जमीन थी। चूँकि भूमि हदबंदी सीमा के तहत क्लास-1 में इससे ज्यादा जमीन एक परिवार के पास नहीं हो सकती थी। यानि वे अमीर व्यक्ति थे। अच्छी खासी उपज थी। उनके पांच बेटे और दो बेटियां हुईं। 5 बेटों में जमीन बंटी 1970 में। फिर एक परिवार के पास रह गयी 3 एकड़ जमीन। अब उनके फिर 5 बच्चे हुए। ऐसे में 3 एकड़ जमीन से खेती से गुजारा मुश्किल होने लगा। ऐसे में उनके 2 बेटे पलायन करके हरियाणा के रेवाड़ी और राजस्थान के भिवाड़ी चले गए जहाँ वे प्राइवेट नौकरी करने लगे। परिवार बढ़ा तो फिर 1990 में बंटवारे में एक के पास जमीन रह गयी 0।6 एकड़ (लगभग 2500 वग मीटर)। अब फिर औसतन हर लड़के के 3 बेटे हुए (लड़कियों की संख्या मैंने जानबूझकर नहीं जोड़ी है क्योंकि वे हिस्सा नहीं ले रही हैं)। ऐसे में 2500 वर्गमीटर की जमीन 3 हिस्सों में बंटी और एक के खाते में 2018 में आयी 800 वर्ग मीटर। मेड़ों में चली गई जमीन को घटाने के बाद इनमें इन्होंने घर बनाये तो खेती या कारखाने या फैक्ट्री या व्यावसाय के लिए बची 400 वर्गमीटर जमीन। अब विचार कीजिये क्या इतनी सी जमीन में खेती संभव है जिससे एक परिवार का भरण पोषण हो सके। अगर ये तबेले भी खोलें तो पशुओं के लिए चारा कहाँ से लायेंगे? सो लगभग इन सभी के बच्चों को पलायन करना पड़ा है जो 1970 से ही आरम्भ हो गया था। अब इनकी जमीनें या तो बंजर पड़ी हैं या जिनके पास जमीन नहीं है, वे बंटाई पर ले रखे हैं। अगर गौर से देखें तो 1960 तक जहाँ एक परिवार के पास 15 एकड़ (लगभग 61,000 वर्गमीटर जमीन थी, अब वह रह गयी मात्र 800 वर्गमीटर)। अब जरा उनकी कल्पना कीजिये जिनके पास तब 2 से 3 एकड़ जमीन रही होगी। उनके वर्तमान परिवारों के हाल क्या होंगे।
एक और समस्या है। जिनके पास थोड़ी बहुत जमीन है भी, वे 20 से 30 स्थानों पर हैं। कोई टुकड़ा 100 मीटर का है तो कोई 200 का तो कोई 500 मीटर का। ऐसे में कैसे आधुनिक खेती संभव है। और आधुनिक खेती संभव नहीं तो उपज कैसे बढ़ेगी, कमर्शियल खेती कैसे होगी। ऐसे में परिवार को पालने के लिए दूसरे राज्यों में पलायन नहीं होगा तो फिर क्या होगा?
बर्बाद बिहार के जनसँख्या विस्फोट का हाल यह है कि जहाँ देश की आबादी 1951 से लेकर अबतक 4 गुना बढ़ी है, वहीँ बिहार की आबादी 7 गुना से भी ज्यादा। 1951 में बिहार की आबादी जहाँ 2 करोड़ थी (झारखण्ड की तत्कालीन जनसँख्या घटाने के बाद), वहीँ आज बिहार की आबादी आज 14 करोड़ से ज्यादा है। इसमें उन लोगों के बड़ी संख्या शामिल नहीं है जो पिछले कई दशकों से बिहार में नहीं हैं, पलायन करके दूसरे राज्यों में चले गए हैं और अब उनकी गिनती बिहार की आबादी में नहीं होती है। इनमें मेरा परिवार भी शामिल है।
एक सच्चाई यह भी है की बिहार में एकमुश्त 10 एकड़ की जमीन आप कोई प्रोजेक्ट लगाने के लिए खरीदना चाहें तो बड़ी मुश्किल से मिलेगी क्योंकि बिहार के बड़े हिस्से में न तो चकबंदी हुई है, न ही इसपर कोई ध्यान दे रहा है। ऐसे में बड़ी परियोजनाओं की गुंजाईश, जिसमे एक साथ हज़ारों लोगों को काम मिल सके, मुश्किल काम है।
बिहार में आबादी की समस्या पहले भी थी और आज भी है। जहाँ दिल्ली, तमिलनाडु, महाराष्ट्र में कुल प्रजनन दर 1।4 है, वहीं बिहार में आज भी यह 3।0 है जो उनकी तुलना में दोगुनी से भी ज्यादा है। देश में बच्चे पैदा करने के मामले यानि प्रजनन दर में बिहार टॉप पर है। यानि बिहार में जनसँख्या विस्फोट अभी भी चालू आहे। देश की औसत प्रजनन दर 1।9 है। बिहार की बात करें तो वहां मुस्लिम आवादी और भी तेजी से बढी है। बिहार के कई जिलों में मुस्लिम प्रजनन दर बहुत अधिक है, जो 4।0 से भी ऊपर है। ये वही जिले हैं जो बांग्लादेश सीमा से सटे हैं और जहाँ घुसपैठ की बड़ी समस्या है। ये जिले हैं, किशनगंज, पूर्णिया, अररिया और कटिहार। 1990-91 की कृषि जनगणना के अनुसार, बिहार में औसत ज़मीन का आकार 2।32 एकड़ था। आज के हिसाब से यह 1।5 से भी कम है। मुस्लिम परिवार के पास ज़मीन का औसत आकार तो इससे भी कम है। ग्रामीण बिहार में मुश्किल से 8।2 प्रतिशत मुस्लिम परिवारों के पास 1।5 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन है। वास्तविकता में सर्वाधिक पलायन भी इन्होंने ही किया है। बिहार मुस्लिम आबादी के मामले में देश में तीसरे स्थान पर है।
ऐसे में जमीन है, नहीं, बिहार में खनिज है नहीं, उद्योग है नहीं, रोजगार है नहीं, तो फिर पलायन रूकेगा कैसे, बिहार विकसित होगा कैसे? अगर चीन की तरह एक बच्चे की नीति बिहार में अगले 50 साल के लिए लागू कर दिया जाये, तभी बिहार की आबादी कम होगी जिसका भार बिहार सहन कर पायेगा और विकास की राह पकड़ पायेगा। पर इस तरफ किसी भी दल का लोई ध्यान नहीं है। बिहार के दल इसपर सोचते नहीं और राष्ट्रीय दलों को तो बिहार से सस्ते मजदूर ही चाहिए जो तभी मिलेंगे जब वहां गरीबी बनी रहे, विकास न हो। ऐसे में बिहार के भविष्य का तो भगवान ही मालिक है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)