कुमार समीर
कैसे कांग्रेस हाल में हुए पांच राज्यों के चुनाव में केरल को छोड कर बांकी बचे चार राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और पांडिचेरी में बुरी तरह हारी है, यह किसी से छिपा है क्या? कहने वालों ने तो यहाँ तक कहना शुरू कर दिया है कि अस्ताचल की ओर जा रही है कॉंग्रेस लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इससे ठीक उल्टा मानते हैं।
उनके मुताबिक कॉंग्रेस की इस हार में भी जीत छिपी हुई है और दूरगामी राजनीति में सब कुछ साफ़ हो जाएगा। यानी इनकी माने तो आने वाले समय में लंबी छलांग लगाएगी कॉंग्रेस और हाल फिलहाल रिजल्ट के लिहाज से अंकगणित में पिछड़ने को दो कदंब पीछे हटने जैसा माना जा रहा है।
कहा जा रहा है कि पांच राज्यों में हुए 2026 के चुनावी रण का सबसे दिलचस्प पहलू मतदाताओं का ‘साइलेंट शिफ्ट’ है, जो कांग्रेस को आने वाले समय में एक बार फिर राजनीति की धुरी बना सकती है। भले ही पांच राज्यों में से चार के ये चुनाव नतीजे अभी कांग्रेस के लिए मुफीद दिखाई नहीं दे रहे हों।
लेकिन सामने दिखाई दे रहे आंकड़ों से भी एक ऐसी कहानी दबी हुई है, जो भविष्य की राजनीति का रुख बदल सकती है। यह कहानी है कांग्रेस के पुनरुत्थान की, जिसे सबसे बड़े सियासी गेनर के तौर पर देखा जा रहा है। इसीलिए पांच राज्यों के चुनावी हार में कांग्रेस की जीत छिपी हुई की बात की जा रही है।
2026 के इस चुनाव परिणामों पर गौर करेंगे तो इसका सबसे दिलचस्प पहलू वोटरों का ‘साइलेंट शिफ्ट’ होना है, जो कांग्रेस को आने वाले समय में एक बार फिर राजनीति की धुरी बना सकती है। यही वज़ह है कि पाँच में से चार राज्यों में हार के बावजूद राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस के लिए ‘रणनीतिक जीत’ मान रहे हैं, क्योंकि सत्ता से ज्यादा पार्टी ने अपनी खिसकी हुई ‘जमीन’ को वापस पाने का मौका दे दिया है, जो कभी उसका गढ़ हुआ करती थी। ऐसे में ‘हार’ के इस शोर के बीच कांग्रेस इस चुनाव की ‘सबसे बड़ी रणनीतिक गेनर’ बनकर उभरी है।
सबसे पहले केरल की ही बात करते हैं जहां कांग्रेस की 10 साल बाद वापसी हुई है। कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है तो लेफ्ट के नेतृत्व वाले एलडीएफ को करारी मात खानी पड़ी है। केरल के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि दक्षिण भारत में कांग्रेस का किला अभेद्य है, जहां बीजेपी के लिए भी सियासी जमीन पथरीली बनी हुई है। इस तरह दक्षिण में कर्नाटक और तेलंगाना के बाद केरल में कांग्रेस की सरकार होगी।
दोनों भाई बहन राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की जोड़ी से लोगों को उम्मीद है। ‘वायनाड में इनका प्रभाव कॉंग्रेस के लिए अच्छा संकेत देता है। वहीं जमीनी स्तर पर संगठन यहाँ अच्छा खासा मजबूत है औऱ यही कारण रहा है कि केरल में कांग्रेस ने दस सालों से काबिज लेफ्ट को उखाड़ फेंकने में कामयाबी हासिल की है।
इसके अलावा बीजेपी भी यहां कुछ नहीं कर पायीं है उसकी तमाम कोशिशों के बाद भी केरल ने कॉंग्रेस पर ही भरोसा जताया, जो कांग्रेस के राष्ट्रीय मनोबल के लिए टॉनिक जैसा है। बता दे कि 2021 में पांच राज्यों में एक भी राज्य में कांग्रेस नहीं जीत सकी थी, लेकिन इस बार लेफ्ट का किला धराशाही करने में सफल रही है। वहीँ अगर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु की बात करें तो वहां भी ‘खोई हुई विरासत’ की वापसी की शुरुआत होती हुई दिखाई दे रही है। इन दोनों ही राज्य में कांग्रेस ने भले ही सरकार न बनाई हो, लेकिन उसने वह सियासी स्पेस कब्जा मौका मिल गया है जो दशकों पहले उसके हाथ से फिसल गया था। बंगाल में कांग्रेस दो सीटें जीतने में कामयाब रही है, जबकि 2021 में उसका खाता तक नहीं खुल सका था। इसके अलावा बंगाल में कांग्रेस को 3 फीसदी वोट शेयर भी हो गया है। बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कमजोर होने से जो’ विपक्ष का खाली स्थान’ पैदा हुआ है, उसे भरने के लिए अब कांग्रेस सबसे स्वाभाविक विकल्प है।
कांग्रेस को मुस्लिम बेल्ट में अपनी सियासी पकड़ को मजबूत करने का मौका मिल गया है, जो कभी लेफ्ट के साथ तो 15 साल से ममता बनर्जी के साथ जुड़ा हुआ रहा है। बंगाल की सत्ता परिवर्तन के बाद बीजेपी बनाम कांग्रेस का मैदान बन सकता है, क्योंकि लेफ्ट कमजोर है जबकि ममता बनर्जी अपने कुनबे को सम्भाल भी पाती है या नहीं यह देखने वाली बात होगी। वहीँ कॉंग्रेस के लिहाज से तमिलनाडु की बात करे तो यह हकीकत है कि यहां करीब छह दशक से सत्ता से बाहर है कॉंग्रेस। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के खिलाफ उपजी सत्ता विरोधी लहर और ‘थलापति’ विजय के उदय के बीच, कांग्रेस ने अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाई है।
दशकों के बाद तमिलनाडु की सियासत द्रविड़ राजनीति से बाहर निकल रही है। तमिलनाडु में विजय को मौका देने का मतलब साफ है कि मतदाता अब पारंपरिक चेहरों से इतर नए विकल्पों को मौका दे रही है।
इसमे दो राय नहीं है कि द्रविड़ सियासत की वजह से ही कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और दोबारा कभी वापसी नहीं कर सकी और कांग्रेस सिर्फ एक ‘जूनियर पार्टनर’ के तौर पर रही है, लेकिन अब जिस तरह विजय की पार्टी को समर्थन देने का ऐलान किया है, उससे साफ है कि मतदाता फिर से एक ‘राष्ट्रीय पार्टी’ के रूप में कांग्रेस की ओर उम्मीद से देख रहा है। इसके अलावा असम की बात करें तो असम के नतीजे कांग्रेस के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं हैं।
यहां बीजेपी भले ही सत्ता की हैट्रिक लगाने में कामयाब रही हो, लेकिन कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल (AIUDF) की राजनीति का अंत कर दिया है। लंबे समय से असम में मुस्लिम वोट बैंक अजमल और कांग्रेस के बीच बंटा रहता था, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलता था, लेकिन 2026 में अल्पसंख्यक मतदाता पूरी तरह कांग्रेस के पाले में आ गए हैं। बदरुद्दीन अजमल की हार ने असम के भविष्य की राजनीति को ‘बाइपोलर'(दो ध्रुवीय) बना दिया है। अब बीजेपी के सामने कोई ‘वोट कटवा’ दल नहीं बचा है, जिससे कांग्रेस की राह आसान नजर आ रही है। कांग्रेस को मुस्लिम वोटों को खोने का डर नहीं होगा और वो अब बीजेपी के वोटबैंक में सेंधमारी के लिए खुलकर खेल सकती है?
कुल मिलाकर देखा जाए तो पांच राज्यों के चुनाव नतीजे ने ममता बनर्जी और बदरुद्दीन अजमल जैसे नेताओं के कमजोर होने से कांग्रेस अब विपक्षी ‘INDIA’ ब्लॉक की सबसे अहम रोल में आ गई है। अब क्षेत्रीय दल कांग्रेस की शर्तों पर राजनीति करेंगे। पिछले कई दशक से कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वह क्षेत्रीय दलों (TMC, DMK) की ‘पिछलग्गू’ बनकर रह गई थी। 2026 के इन चुनाव नतीजों ने कांग्रेस को एक नया ‘स्पेस’ दिया है।
कांग्रेस के लिए मौका है कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई जान फूंकने का क्योंकि इन चुनावों ने सुस्त पड़े कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संजीवनी दे दी है। उत्तर से दक्षिण तक पार्टी के कैडर को उत्साहित करने की जरूरत है कि वह अब ‘डिफेंसिव’ नहीं, बल्कि ‘ऑफेंसिव’ मोड में आ जाए क्योंकि राजनीति में कभी-कभी एक कदम पीछे हटना, लंबी छलांग की तैयारी होती है।
2026 के विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए वही ‘लंबी छलांग’ साबित होने वाले हैं। पार्टी ने अपनी पुरानी जमीन वापस पा ली है, क्षेत्रीय सहयोगियों को अपनी ताकत दिखा दी है और केरल जैसा महत्वपूर्ण राज्य अपनी झोली में डाल लिया है। अगर आप सिर्फ ‘सत्ता’ को जीत मानते हैं, तो बीजेपी जीती है, लेकिन अगर आप ‘भविष्य की संभावनाओं’ को जीत मानते हैं, तो कांग्रेस ने बाजी मार ली है। 2029 का महासमर अब और भी रोमांचक होने वाला है, क्योंकि उसे सियासी तौर पर उभरने का मौका मिल गया है।
फ़िर से बीजेपी बनाम कांग्रेस होने वाला है
तमिलनाडु में गठबंधन के बावजूद कांग्रेस ने अपनी स्ट्राइक रेट में सुधार किया है। अब कांग्रेस दिल्ली में ‘जूनियर पार्टनर’ के बजाय एक ‘निर्णायक शक्ति’ के रूप में सौदेबाजी करने की स्थिति में है। 2026 के नतीजों ने एक बात साफ कर दी है कि ममता बनर्जी या अन्य क्षेत्रीय नेता चाहे स्टालिन हों, केजरीवाल हो, अखिलेश यादव हो या कोई और क्षेत्रीय नेता हो राष्ट्रीय स्तर पर मोदी को चुनौती देने वाले ‘एकमात्र चेहरे’ नहीं हो सकते। क्षेत्रीय दलों के अपने-अपने गढ़ों में कमजोर पड़ने के बाद, अब 2029 के लिए ‘INDIA’ गठबंधन का नेतृत्व निर्विवाद रूप से कांग्रेस और राहुल गांधी के पास आ गया है। इन हारों ने कांग्रेस को मौका दिया है कि वह उन राज्यों में नए और युवा नेतृत्व को आगे लाए, जहां पुराने चेहरे बोझ बन चुके थे।
इतिहास गवाह है कि जब-जब क्षेत्रीय दल धराशायी हुए हैं, कांग्रेस ने वापसी की है। 2026 के नतीजों ने बीजेपी को सत्ता तो दी, लेकिन कांग्रेस को ‘संजीवनी’ दी है। क्योंकि क्षेत्रीय दलों की राजनीति सिमटने से आगे की सियासी लड़ाई केवल और केवल कांग्रेस बनाम बीजेपी ही हो सकती है।