अर्जुन देशप्रेमी
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार के पतन के साथ ही देश में भाजपा और एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के विकल्प को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। जिस तरह से भाजपा और उसके गठबंधन एनडीए ने एक के बाद एक राज्यों में विधानसभाओं के चुनाव जीते हैं, उससे विपक्षी खेमे में हाहाकार मचना अस्वाभाविक नहीं है।एक के बाद दूसरे राज्य में क्षेत्रीय पार्टियों के अलावा कांग्रेस भी भाजपा और एनडीए के सामने घुटने टेक रही थी। ले देकर वोट चोरी और ईवीएम हैक करने की बात करके विपक्ष अपनी हार की झेंप मिटा रहा था। पर उसे लगा था कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में क्रमशः ममता बनर्जी और एमके स्टालिन तो जरूर अपने किले को बचाएंगे। पर ऐसा नहीं हुआ।
एमके स्टालिन की डीएमके को नयी नवेली पार्टी जोसेफ़ विजय की टीवीके ने धूल चटा दी तो बंगाल में भाजपा ने अकेले दम ममता की तृणमूल कांग्रेस को बुरी तरह धो डाला। इसमें भी पश्चिम बंगाल में विपक्षी खेमे की हार ज्यादा परेशान करने वाली दिख रही है जिसे लेकर इंडिया गठबंधन के नेता कुछ ज़्यादा ही परेशान हैं। इसका एक कारण तो यह है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अगले साल के आरंभ के महीने में ही चुनाव है। साथ ही पंजाब में भी चुनाव होने हैं। जिस तरह से ममता के मजबूत समझे जाने वाले गढ़ को भाजपा ने ढहाया है, उससे इंडी गठबंधन में बेचैनी आसानी से समझी जा सकती है। शायद यही कारण है कि इंडी गठबंधन के नेता नए सिरे से इसे मजबूती देने की बातें करने लगे हैं। पर इसमें जो बात सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह है कि यही लोग अब से पहले अपनी ढपली, अपना राग अलापने में लगे थे। दिल्ली के चुनावों में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ा। नतीजा दोनों ही हार गए और भाजपा ने सरकार बना ली। बिहार में भी इंडी गठबंधन के दल आपस में ही बिड गए। एआईएमआईएम ने अपने उम्मीदवार उतारे जिसने राजद के खेल बिगाड़े। बंगाल में ममता को लगा कि वह अकेले ही काफ़ी हैं भाजपा को पटखनी के लिए। सो वह भी ममता और कांग्रेस ने सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। हुमायूँ कबीर और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने भी अपने उम्मीदवार उतार दिए। नतीजा सबके सामने है। भाजपा के आगे टीएमसी टिक नहीं पाई।
पिछले चुनावों में उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा एक नहीं हो पाए। कांग्रेस के साथ सपा का दूसरी बार गठबंधन नहीं हो पाया। नतीजा यह हुआ कि भाजपा के योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बन गए। यानि पिछले कुछ चुनावों को देखा जाए तो इंडी गठबंधन कहीं भी एक नहीं दिखा है। दिक्कत यह है कि कांग्रेस चाहती है कि क्षेत्रीय दल उसे ज़्यादा सीटें दें और उसके अनुसार चलें, तो क्षेत्रीय दल कहते हैं कि उनके राज्य में कांग्रेस का कोई अस्तित्व ही नहीं है। ऐसे में कांग्रेस उनको सपोर्ट करे। अगर कांग्रेस उनको सपोर्ट करती है, तो कांग्रेस साफ़ होगी और अगर क्षेत्रीय दल कांग्रेस को सपोर्ट कराटे हैं रो क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व समाप्त होगा। इसका बड़ा कारण यह है कि ये सभी एक दूसरे के ही वोट बैंक के भरोसे हैं। ज्यादातर तो मुस्लिम वोटों पर ही नज़र गड़ाए हुए हैं जिसपर कांग्रेस की नज़र है। ऐसे में आने वाले चुनावों में कौन किसके लिए कुर्बानी देगा, यह सवाल हमेशा बना रहेगा।
यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है कि जबतक केजरीवाल दिल्ली की सत्ता में रहे, तब तक उनको इंडी गठबंधन की खास चिंता नहीं रही। सबसे पहले वही गठबंधन से अलग हुए।यही हाल ममता बनर्जी का भी रहा। ममता ने हमेशा अपने को ही सबसे बड़ा माना। पर जब दोनों को ही हार मिली तब इनको इंडी गठबंधन को मजबूत करने की याद आ रही है। ऐसे में असली सवाल तो यह है कि अबतक ये लोग सो क्यों रहे थे? अब तक एक दूसरे के ख़िलाफ़ ही क्यों लड़ रहे थे? देश में जिस तरह की राजनीतिक स्थिति है और भाजपा जिस तरह से काम कर रही हैउससे साफ़ है कि अगर समय रहते ये नहीं चेते तो लगता नहीं है की आने वाले अनेक वर्षों के दौरान भी ये भाजपा और एनडीए के विजय रथ को रोक पाएंगे।
वैसे भी इंडिया गठबंधन का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे भाजपा के ‘हिंदुत्व और राष्ट्रवाद’ के विमर्श के सामने कौन सा ठोस वैकल्पिक मॉडल पेश करते हैं। गठबंधन के लिए केवल “भाजपा का विरोध” पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम विकसित करना होगा जो बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक न्याय (जाति जनगणना जैसे मुद्दे) पर स्पष्ट नीति दे सके। यदि गठबंधन एक वैकल्पिक ‘विज़न डॉक्यूमेंट’ तैयार करने में सफल रहता है, तो जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता और बढ़ेगी।
इस गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी इसके क्षेत्रीय क्षत्रप हैं। ममता बनर्जी (टीएमसी), अरविंद केजरीवाल (आप), एम.के. स्टालिन (डीएमके) और उद्धव ठाकरे जैसे नेताओं का अपने राज्यों में मजबूत आधार है। भविष्य में चुनौती यह होगी कि ये नेता राष्ट्रीय हित के लिए अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं और सीटों के बंटवारे में कितना लचीलापन दिखाते हैं। यदि कांग्रेस एक ‘बड़े भाई’ के रूप में खुद को थोपने के बजाय एक ‘समन्वयक’ की भूमिका निभाती है, तो गठबंधन की उम्र लंबी होगी।
लोकतंत्र में चेहरा बहुत मायने रखता है। भाजपा के पास नरेंद्र मोदी जैसा सशक्त चेहरा है। इंडिया गठबंधन के सामने भविष्य की बड़ी चुनौती यह है कि क्या वे बिना किसी एक चेहरे के चुनाव लड़ते रहेंगे या राहुल गांधी या किसी अन्य नेता को सर्वसम्मति से अपना नेता चुनेंगे? हालांकि 2024 के नतीजों ने राहुल गांधी की स्वीकार्यता बढ़ाई है, लेकिन गठबंधन के अन्य घटक दलों को विश्वास में लेना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया होगी।
गठबंधन की सफलता केवल रैलियों से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के तालमेल से तय होती है। भविष्य में इंडिया गठबंधन को जिला और ब्लॉक स्तर पर साझा समितियां बनानी होंगी। अक्सर देखा गया है कि शीर्ष नेता तो साथ आ जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी (जैसे बंगाल में वामपंथ और तृणमूल) गठबंधन की राह में रोड़ा बनती है। इस कैडर-स्तर के घर्षण को कम करना गठबंधन के अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है।
आने वाले समय में महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड जैसे राज्यों के चुनाव गठबंधन की एकता की असली परीक्षा होंगे। यदि ये दल राज्य स्तर पर एकजुट होकर चुनाव लड़ते हैं और जीत हासिल करते हैं, तो 2029 की राह उनके लिए आसान हो जाएगी। हार की स्थिति में अक्सर गठबंधन टूटने लगते हैं, इसलिए जीत का मोमेंटम बनाए रखना अनिवार्य है।
गठबंधन का भविष्य इस बात पर भी निर्भर करेगा कि वे भाजपा की घेराबंदी का सामना कैसे करते हैं। केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और दलबदल की राजनीति (जैसा कि हमने बिहार में नीतीश कुमार के मामले में देखा) गठबंधन की स्थिरता को हिला सकती है। वैचारिक रूप से कमजोर कड़ियां इस दबाव में गठबंधन छोड़ सकती हैं, जो इसे कमजोर कर सकता है।
इंडी गठबंधन का भविष्य ‘संघर्ष और समन्वय’ के बीच झूल रहा है। यह महज एक चुनावी गठबंधन न रहकर यदि एक वैचारिक आंदोलन बन पाता है, तो यह भारतीय राजनीति में एक नई धुरी स्थापित कर सकता है। भारत की विविधतापूर्ण राजनीति में गठबंधन ही भविष्य है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर टिकी है कि क्या इसके घटक दल व्यक्तिगत अहंकार को त्यागकर ‘लोकतंत्र बचाओ’ के अपने प्राथमिक नारे को धरातल पर उतार पाते हैं या नहीं। यदि वे एकजुट रहते हैं, तो वे न केवल सत्ता के प्रबल दावेदार होंगे, बल्कि भारत की संसदीय परंपरा में एक संतुलित शक्ति का केंद्र भी बने रहेंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)