अर्जुन देशप्रेमी
पिछले कुछ समय के दौरान लगातार कुछ ऐसी घटनाएं और गतिविधियाँ हो रही हैं जिनको लेकर भारत घिरता नज़र आ रहा है। पहले श्रीलंका, फिर बांग्लादेश और हाल ही में नेपाल में जो कुछ हुआ, वह भारत के लिए किसी भी लिहाज़ से अच्छा नहीं माना जा सकता है। इसी बीच भारत और पाकिस्तान के बीच जंग भी होती है जिसके बाद अमेरिका अचानक से पकिस्तान के पाले में चला जाता है और भारत पर एक के बाद एक आरोपों की बौछार ही नहीं करता, वरन भारत पर टैरिफ बम भी फोड़ देता है। जिस रूस और युक्रेन युद्ध से भारत का कोई लेना देना नहीं है, उसे मोदी का युद्ध बताने लगता है और उसकी आड़ में भारत पर एक तरह से प्रतिबंधात्मक शुल्क (टैरिफ) भी लगा देता है जिससे भारत के लिए अमेरिका को किया जाने वाला निर्यात प्रभावित होता है। इन सबसे अभी उबरने की प्रक्रिया चल ही रही होती है कि अचानक से सऊदी अरब और पकिस्तान के बीच एक ऐसा समझौता होता है जिसका सीधा असर भारत पर पड़ना तय है।
दरअसल सऊदी अरब और पाकिस्तान ने 17 सितंबर, 2025 को जिस ‘रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते’ पर हस्ताक्षर किए हैं उसके तहत, किसी भी देश पर हमला होने पर इसे दोनों पर हमला माना जाएगा, यानि अगर भारत ऑपरेशन सिन्दूर के तहत या किसी और कारण से पकिस्तान पर हमला करता है, तो सऊदी अरब अपने ऊपर हमला मानेगा और भारत से युद्ध आरम्भ करेगा। यह समझौता पश्चिमी देशों के नाटो संगठन के समान है, जिसमें “एक पर हमला, सब पर हमला’ का सिद्धांत अपनाया जाता है। इसके साथ ही इस समझौते से सऊदी अरब को पाकिस्तान के परमाणु हथियार का अप्रत्यक्ष लाभ मिलेगा, जबकि आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को सऊदी अरब से वित्तीय सहायता मिल सकती है।
इससे पकिस्तान को एक तरह से सऊदी अरब से भारी भरकम आर्थिक मदद मिलेगी जिनसे वह हथियार खरीदेगा और जाहिर है वह उनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ करेगा। इतना ही नहीं, अगर समझौते को सऊदी अरब ठीक से मानेगा तो वह अपने प्रभाव वाले दूसरे मुस्लिम देशों को भी भारत के खिलाफ लामबंद करेगा जिससे पकिस्तान को और मदद मिलेगी।
कहने को तो यह समझौता पश्चिम एशिया में नए समीकरणों का संकेत देता है, खासकर कतर पर हाल ही में इजरायली हमले और अमेरिका पर से घटते भरोसे के बाद। पर सच यह है कि सऊदी अरब और अमेरिका के बीच सामरिक सुरक्षा का समझौता है जिससे उसके पास अमेरिका के हथियार भी हैं और अमेरिका पर प्रभाव भी। ऐसे में इसका भी भारत पर असर पड़ सकता है।
सच में देखें तो भारत के लिए एक गंभीर मामला है। भारत की मुख्य चिंता यह है कि पाकिस्तान इस समझौते का सहारा लेकर भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा दे सकता है, यह जानते हुए कि सऊदी अरब से उसे वित्तीय और कूटनीतिक मदद मिलेगी। हालाँकि भारत के सऊदी अरब के साथ मजबूत व्यापारिक और सामरिक संबंध हैं। सऊदी अरब भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है। पकिस्तान के साथ जंग में वह भारत की तेल आपूर्ति रोक भी सकता है।
हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि सऊदी अरब कोई ऐसी सैन्य ताकत नहीं है जिससे भारत पर इसका बड़ा असर पडेगा, पर आर्थिक रूप से पकिस्तान को इससे मजबूती मिलेगी जो भारत के खिलाफ जाएगी। बड़ी दिक्क़त यह होगी कि भारत तेल के लिए आयात पर निर्भर है और सऊदी अरब से भारत बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है। अगर संकट के समय सऊदी अरब ने तेल रोका तो दिक्क़त और बढ़ जाएगी। पर अच्छी बात यह है कि भारत अब तेल के लिए मिडिल ईस्ट पर ज़्यादा निर्भर नहीं रहेगा।
अंडमान सागर में लगभग 2 लाख करोड़ लीटर कच्चे तेल का बड़ा भंडार मिलने की संभावना जताई जा रही है। अगर यह अनुमान सच हुआ, तो भारत की जीडीपी। जो फिलहाल 4.18 ट्रिलियन है, वो सीधा 20 ट्रिलियन तक पहुंच सकती है। इस खोज के बाद देश को बाहर से तेल आयात करने की ज़रूरत भी काफी कम हो जाएगी। वैसे भी भारत ने रूस से तेल आयात बढ़ाया है और दूसरे देशों से निर्भरता कम की है। जिस तरीके से भारत सौर उर्जा से ऊर्जा प्राप्ति को बढ़ाया है और बिजली से चलने वाली गाड़ियों पर फोकस किया है। ऐसे में तेल भारत के लिए संभलना काफी हद तक मुमकीन होगा।
दूसरी बात यह भी सच है कि भारत पकिस्तान जंग में सऊदी अरब का कूदना काफी मुश्किल ही लगता है। अगर वह ऐसा करता है, तो उसके सैकड़ों अरब डालर के भारत में निवेश पर पानी फिर सकता है और सऊदी अरब के लिए जरूरी जिंसों की चेन सप्लाई पर असर पड़ सकता है। इसके बाद भी पाकिस्तान को सऊदी अरब का समर्थन मिलने से दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बदलने का ख़तरा दिख रहा है।
“मुस्लिमब्रदर हुड’ के नाम पर इसी तरह के समझौते पकिस्तान यदि दूसरे कुछ मुस्लिम देशों के साथ भी करता है तो यह स्थिति भारत के लिए और खतरनाक हो सकती है। संभव है कि भारत की स्थिति इजराइल जैसी हो जाये। इससे पाकिस्तान को कश्मीर, आतंकवाद या जल-विवाद जैसे मुद्दों पर अधिक कठोर रुख अपनाने का बल मिल सकता है जो किसी भी नज़रिए से भारत के लिए ठीक नहीं होगा।
ऐसे में भारत को सऊदी अरब के साथ अपने संबंधों को सावधानी से निभाना होगा ताकि यह समझौता दोनों देशों के बीच संबंधों को खराब न करे। समय आ गया है जब भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों की समीक्षा करे और संभावित खतरों से निपटने के लिए नई रणनीतियाँ बनाये। भारत को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अन्य देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की भी जरूरत है, खासकर उन देशों के साथ जो इस समझौते से प्रभावित हो सकते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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