डॉ. सुभाष गुप्ता
जिस देश में अखबार में लिखे हुए शब्दों को कल तक सच का प्रमाण माना जाता था। जहां लोग किसी भी घटना या स्थिति के संबंध में अपनी बात को सही ठहराने के लिए सबसे बड़े और आखिरी तर्क के रूप में कहते आये हैं कि अमुक बात अखबार में छपी है। पूरे देश का इस मीडिया पर अटूट भरोसा था, लेकिन अब हालात बहुत बदल गये हैं। आज मीडिया के शब्दों पर कई सदियों से कायम भरोसा छीजने लगा है। अब तमाम चैनल और अखबारों के शब्दों पर आवाम विश्वास नहीं कर रहा है। लोग मीडिया के जिन शब्दों को सच का प्रमाण माना करते थे, उन्हें ही अब संदेह की निगाहों से देखने लगे हैं।
हालात बताते हैं कि मीडिया इस वक्त एक भयानक दौर से गुजर रहा है। ये दौर विश्वसनीयता के संकट से उपजा है। मीडिया की अहमियत पर भी सवालिया निशान लगा रहा है। यह खतरे की घंटी है, जिसकी गूंज देश भर में सुनाई दे रही है। मीडिया का एक बड़ा तबका इससे बेचैन है और हालात में बदलाव चाहता है।
मीडिया की यह दुर्गति क्यों हुई? इसे समझने के लिए मीडिया के उस सुनहरे अतीत को समझना जरूरी है। आजादी की लड़ाई के दौरान जब अखबारों की शुरुआत हुई, तब उनका मकसद केवल और केवल गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए अलख जगाना, लोगों को एकजुट करना और जुल्मी को बेनकाब करना था। उस दौर में पत्रकारिता केवल एक मिशन थी। ये वह समय था, जब अखबार निकालने या पत्रकारिता करने का मतलब खुद को संकट में डालना था। जब्ती, जेल, कोड़े बरसाने जैसी सजायें आम थी। सम्पादकों व पत्रकारों ने ब्रिटिश हुकूमत के ऐसे तमाम जुल्मों के बावजूद न तो कभी समझौते किये और न सच से दूर हुए। पत्रकारों पर होने वाले जुल्मों और उनकी कुर्बानियों ने देशवासियों के दिल और दिमाग में यह तथ्य कूट कूटकर भर दिया था कि पत्रकार न डरते हैं और न बिकते हैं।
21 वीं सदी तक अखबार उसी भरोसे का प्रतीक बने हुए थे। हालांकि आजादी का मकसद पूरा होने के बाद अखबारों के उद्देश्य बदल गये। 21वीं सदी की दस्तक होने तक नये-नये अखबारों के साथ देश में इलेक्ट्रानिक मीडिया का उदय होना शुरु हुआ। काफी ऐसे लोग भी मीडिया में उद्योगों की तरह निवेश करने के लिए आगे आये, जिनका उद्देश्य कोई मिशन चलाना नहीं, बल्कि मुनाफा कमाना था। लिहाजा, धीरे धीरे मिशन की जगह व्यवसाय ने ले ली, लेकिन यह व्यवसाय के रूप में भी बहुत सम्मानित और विश्वास से जुड़ा काम था। एक ऐसा व्यवसाय जो किसी मिशन की तरह सच को सामने लाने का काम करता था। सच चाहे लाख पर्दों के पीछे छिपा हो। तरह – तरह के जोखिम उठाकर पत्रकार सच को बेनकाब करते आये हैं। सच में मिलावट करना, आधे सच को सच की तरह पेश करना और सच को छिपाकर बैठ जाना इसके उसूलों के खिलाफ है। पत्रकारिता ने एक व्यवसाय होकर भी अपनी पवित्रता को बनाये रखा, भले ही इसके लिए हर साल कई पत्रकारों को मौत को गले लगाना पड़ा हो।
दुनिया के 180 देशों में मीडिया और पत्रकारों की स्थिति का अध्ययन करने वाली प्रमुख संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के आंकड़े गवाह हैं कि भारत का मीडिया और यहां के पत्रकार सच के लिए लड़ने और अपनी जान की बाजी लगाने से पीछे नहीं हटते। इसकी रिपोर्ट बताती है कि पिछले एक दशक में भारत में माफिया, भ्रष्टाचार आदि के खिलाफ लिखने वाले 28 पत्रकारों की उनके काम के दौरान हत्या कर दी गई। इस संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देशों में गिना जाता है।
आज पत्रकारिता में एक तरफ जान जोखिम में डालने का जुनून है और दूसरी तरफ भरोसे का संकट। मीडिया आज इन दो तरह की विरोधाभाषी स्थितियों से गुजर रहा है। संकट के इस दौर में उन्हें भी संदेह की निगाहों से देखा जाने लगा है, जो मीडिया घराने और पत्रकार कभी सच से मुंह नहीं मोड़ते और खबरों पर समझौते नहीं करते। आवाम और सच के लिए लड़ने वाले अखबारों पर होने वाले जुल्मों को भी पूरे देश ने अपनी आंखों से देखा है।
जेन-जी के आंदोलन के दौरान मीडिया ने ऐसे दुर्दिन देखे हैं, जिनकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। आंदोलनकारी युवाओं ने मेन स्ट्रीम मीडिया के एक बहुत बड़े वर्ग को नकार दिया। इन युवाओं ने मीडिया के इस वर्ग की उपयोगिता को भी खारिज कर दिया। न तो उसे अपने बीच आने दिया और न ही खबरों के लिए उनकी ओर देखा। इन आंदोलनकारी युवाओं को उस मीडिया से इंसाफ भी नहीं मिला। मीडिया के इस वर्ग ने युवाओं की खबरों को जगह भी नहीं दी यानि उन्हें गायब कर दिया। इसके बावजूद युवाओं का आंदोलन सफल रहा। मीडिया के एक बड़े वर्ग की अनदेखी और युवाओं के भी उसे तवज्जो न दिये जाने के बावजूद देश और विदेशों में आंदोलन की खबरें पहुंची और खूब पहुंची। दुनिया के कई देशों के युवा इन आंदोलनकारी युवाओं के समर्थन में उठ खड़े हुए और देश के विभिन्न हिस्सों के जेन-जी इस आंदोलन के समर्थन में सड़कों पर आये।
इस आंदोलन के दौरान मेन स्ट्रीम मीडिया के तमाम लोग बुरी तरह एक्सपोज हो गये। उनकी विश्वसनीयता पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। यह मीडिया के लिए चिंता का विषय है। चिन्ता का दूसरा विषय है कि जेन-जी ने एक्सपोज हो चुके मेन स्ट्रीम मीडिया को एक तरह से नकार ही दिया। सोशल मीडिया की एक्सपर्ट माने जाने वाली पीढ़ी जेन-जी ने मेन स्ट्रीम मीडिया की मदद के बगैर देश और दुनिया तक अपनी बातें बहुत प्रभावशाली ढंग से पहुंचाई और यह दर्शा दिया कि मेन स्ट्रीम मीडिया के बगैर भी वे पूरी दुनिया से जुड़ सकते हैं। यह स्थिति मीडिया की उपयोगिता पर सवाल खड़े करने वाली है। मेन स्ट्रीम मीडिया को दूर रखकर कोई आंदोलन इतना सफल हो सकता है, तो कल जब देश की बागडोर इस पीढ़ी के हाथों में होगी, तब ऐसे मीडिया को कौन पूछेगा?
इन स्थितियों को बदलने का वक्त तेजी से निकलता जा रहा है। मीडिया को इस पर विचार करना ही होगा कि वह अपनी विश्वसनीयता कायम कैसे रख सकता है? कई संस्थानों को दुबारा आवाम का भरोसा जीतने के लिए कई तरह की चुनौतियों से भी गुजरना पड़ सकता है। एक बार टूटने के बाद भरोसे को दुबारा कायम करना आसान नहीं होता। मीडिया के एक वर्ग ने विश्वास के इस संकट से उबरने की जो कोशिशें शुरु की हैं, ईमानदारी कायम रही तो उनके कामयाब होने की उम्मीद की जा सकती है।
(लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में ढाई दशक से ज्यादा सक्रिय रहने के बाद पत्रकारिता के प्रोफेसर के रूप में सेवारत हैं)