प्रदीप शर्मा दत्तात्रेय
आज श्रावण मास में अमावस्या और सूर्यग्रहण है… भारत में यह सूर्यग्रहण का समय रात्रि ९ बजे के बाद है… इसलिए दृष्टिगोचर नहीं होगा… फ़ेसबुक पर अनेक मन्दिरों द्वारा ऑनलाइन पूजा की सुविधा देते पोर्टलों द्वारा यह भी खूब प्रचारित किया जा रहा है कि इस दिवस और पूर्णिमा के मध्य पितरों को प्रसन्न किया जा सकता है… अब चूँकि पितृदोष से अनेक समस्याएं उत्पन्न होती हैं.. इसलिए पितृदोष से भयभीत धड़ाधड़ ऑनलाईन बुकिंग हो भी रही है… यह भी एक अच्छा व्यापार प्रचलन में आ गया है… आजकल एक और प्रथा चल पड़ी है… माता-पिता की सेवा करने की प्रेरक गीत-कविताएं और कहानियाँ… अभी पिछले दिनों एक व्यक्ति की मृत्यु पर दाह-संस्कार पर उसकी लड़कियों के पहुंच पाने में असमर्थता और व्हिडिओ कॉन्फ़्रेंसिंग पर देखा जाने प्रमुख समाचारों में अपनी जगह बना गया… अभी पिछली खबर चर्चा से बाहर ही नहीं पाई थी कि एक और खबर आ गई… भोपाल में वृद्धाश्रम में रहते एक और सज्जन का स्वर्गवास हो गया.. कहते हैं कि उन्होंने साइकिल की ट्यूब टायर की विक्रय एवं पंक्चर लगा-लगाकर चार बच्चों की परवरिश की थी… अब उन्हें चार बच्चों से चार कंधे भी नसीब नहीं हुए… बताया तो यहां तक जा रहा है कि बेटियां… इसलिए नहीं आईं.. क्योंकि उन्हें सम्पत्ति में हिस्सा नहीं मिला… बेटों का कथन है कि उन्हें सम्पत्ति में मिला ही क्या … जो वो आते… प्रथमदृष्ट्या तो यह प्रसंग अत्यंत कष्टकारी है…
मित्रों… सनातन धर्म में अंत्येष्टि क्रिया १६ संस्कारों में अंतिम संस्कार माना गया है… आइए… इन सभी सोलह संस्कारों की महत्ता और आवश्यकता की पड़ताल करते हैं… किसी भी जातक के जन्म से पूर्व ३ संस्कार हैं… गर्भाधान ( इस संस्कार में श्रेष्ठ संतान की कामना और मानसिक शुद्धि के लिए )… पुंसवन..(इस संस्कार में गर्भधारण के तीसरे-चौथे महीने में स्वस्थ संतान की कामना और गर्भ की रक्षा के लिए)… सीमन्तोन्नयन (गर्भ की रक्षक स्त्री प्रसन्नता के लिए)… बचपन और शिक्षा के लिए ११ संस्कारों में… जातकरण… (जन्मसमय पर नालच्छेदन)..नामकरण..(जन्म से ११वें दिन गृहशुद्धि और शिशु का नामकरण).. अन्नप्राशण (शिशु को प्रथम बार ठोस आहार…अन्न खिलाना).. चूढ़ाकर्म (प्रथम बार केश उतरवाना… मुण्डन)… कर्णवेध..( कानों को छिंदवाड़ा… स्वास्थ्य और आभूषण धारण हेतु)… विद्यारम्भ..(शिशु को अक्षरधाम और विद्या की महत्ता से परिचय कराना).. उपनयन..(जनेऊ धारण और गुरूकुल जाने के समय)… वेदारम्भ..(गुरूकुल में वेदों एवं शास्त्रों के अध्ययन के समय)… केशान्त.. (शिक्षाकाल में प्रथम बार दाढ़ी-मूँछ व केशों का मुंडवाना)… समावर्तन (गुरूकुल शिक्षा की समाप्ति और गृहस्थ प्रवेश के समय)… और अन्त में गृहस्थ जीवन में २ संस्कार… विवाह.. (गृहस्थ प्रवेश में विवाहोत्सव के अवसर पर)..और अंत्येष्टि (मृत्यु के अवसर पर दाह संस्कार)… मित्रों… आजकल बदलते परिवेश में जन्म से पूर्व के ३ और जन्म के बाद शिक्षा-अध्ययन तक के ११ संस्कारों में केवल नामकरण संस्कार ही प्रचलन में है.. उपनयन संस्कार भी … विवाह के समय कुछ दिन पूर्व करा लेने की प्रथा बन गई है… अंत्येष्टि/ दाह संस्कार के प्रति भी युवापीढ़ी उदासीनता… चिन्ताजनक है…
सच कहूं … तो इन सभी संस्कारों के लोप और अप्रतिष्ठित होने को भी हम ही उत्तरदायी हैं… हमने अनावश्यक ही कुछ रीतियों…और परम्पराओं.. को जन्म दे दिया… जन्म से पहले और बाद में शिक्षा-दीक्षा तक के १४ संस्कारों के महत्व को ना खुद समझ पा रहे और ना ही युवा पीढ़ी को समझा पाए… हम प्रति वर्ष जन्मदिन उत्सव में केक काटने की परम्परा… विवाह से पूर्व सगाई… विवाह के पश्चात् हनीमून ट्रिप… वैवाहिक वर्षगांठ के उत्सवों…सरीखी अनावश्यक रिवाज निभाने से सनातन संस्कृति की परिधि से अनजाने ही बाहर आ गए लगते हैं… फिर अंत्येष्टि के पश्चात् भी दसंवा… तेरहवीं… हर माह ब्राह्मण भोज… बरसी और तत्पश्चात् चौबरसी आदि रीति-रिवाजों के चक्रव्यूह में युवापीढ़ी बचना चाहती है… इसलिए जहां उन्हें मौक़ा मिले… तिनका तोड़ बैठती है…
मित्रों … मैं… केवल उनके पक्ष की मानसिकता की पड़ताल कर रहा था…संस्कृत में “पुत्र” शब्द की व्युत्पत्ति के सन्दर्भ में कहा गया … “पुन्नाम्नो नरकात् त्रायते इति पुत्रः” अर्थात जो ‘पुद्’ या ‘पुं’ नामक नरक से पिता या माता की रक्षा (त्राण) करता है…वह संतान पुत्र कहलाती है…शास्त्रों में इस शब्द का प्रयोग पुत्र और पुत्री दोनों प्रकार की संतानों के लिए व्यापक रूप से किया गया है… अब प्रश्न है कि पुत् अथवा पुं नामक नरक क्या है… मनुस्मृति और महाभारत में ‘पुत्’ या ‘पुं’ नामक एक विशेष नरक का वर्णन मिलता है…ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति निःसंतान होता है या जिसकी कोई संतान उसका अंतिम संस्कार नहीं करती…उसे मरणोपरांत इस ‘पुत्’ नामक नरक में जाना पड़ता है… संतान का कर्तव्य है कि वह पिता को इस नरक से बचाए… यदि हम इस मान्यता की कसौटी पर चर्चित घटनाओं को कसें… तो उनकी संतति को दोषी ठहराया जाना सर्वथा उचित प्रतीत होता है… लेकिन उक्त स्थिति में हम समाज की पतनोन्मुखी गति कैसे विस्मृत करेंगे… जो केवल अन्त्येष्टि संस्कार में संतति की उदासीनता के प्रति तो व्याकुल दिखती है लेकिन अन्य शेष १५ संस्कारों के प्रति संवेदनशीलता और कर्तव्य बोध को नहीं समझ पा रही… विचारिए श्रेष्ठ संतान की कामना से प्रारम्भ शिक्षा-दीक्षा तक १४ संस्कारों को घोलकर पी जाने के पश्चात मुझे तो संतान से श्रवण कुमार या राम होने की अपेक्षा करना सरासर अनुचित है.. कुमार्ग गामी संताने पहले भी हुआ करती थीं… आज भी होती हैं… और अपना कर्तव्य ना निभा पाने वाले अभिभावक पहले भी होते थे और आज भी होते हैं… दोष… समय और समाज की दिशा और दशा का है…