अर्जुन देशप्रेमी

आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इस तीव्र आर्थिक विकास, बढ़ते औद्योगिकरण और शहरीकरण के कारण देश में बिजली और ऊर्जा की मांग अभूतपूर्व दर से बढ़ रही है। पर समस्या यह है कि भारत के पास अपना तेल और गैस भंडार काफ़ी कम है। इसके कारण हमें भारी मात्र में इनका आयात करना पड़ता है। किसी से छुपी हुई बात नहीं है की इसके कारण देश को कितनी समस्याओं से जूझना पड़ता है। युद्ध में दूसरे देश जाते हैं और हालत हमारे बिगड़ते हैं। हमारे यहाँ महंगाई आसमान छूने की और चल देती है। इनके आयात पर देश की बहुत बड़ी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। इसके बाद भी लगाने लगता है कि अगर आयात प्रभावित हुआ तो हमारा होगा क्या?
वर्तमान में, भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के एक बहुत बड़े हिस्से के लिए कोयले, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर है।लेकिन जीवाश्म ईंधनों की अपनी सीमाएं हैं—ये पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाते हैं, इनके वैश्विक दाम अस्थिर रहते हैं और इनके भंडार सीमित हैं। जलवायु परिवर्तन के खतरों को देखते हुए भारत ने साल 2070 तक ‘नेट-जीरो’ कार्बन उत्सर्जन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को पाने और अपने ऊर्जा संकट को हमेशा के लिए दूर करने के लिए भारत को सौर और पवन ऊर्जा के साथ-साथ अन्य नवीकरणीय स्रोतों को भी अपनाना होगा। इसी संदर्भ में भूतापीय ऊर्जा एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है।
भूतापीय ऊर्जा पृथ्वी के भीतर छिपी गर्मी (ताप) से मिलने वाली प्राकृतिक ऊर्जा है। ‘भू’ का अर्थ है पृथ्वी और ‘तापीय’ का अर्थ है तापमान या गर्मी। यह एक नवीकरणीय और स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत है, क्योंकि पृथ्वी के अंदर की यह गर्मी लगातार बनी रहती है और कभी खत्म नहीं होने वाली है।हमारी पृथ्वी के केंद्र का तापमान लगभग 5,000°C से 6,000°C तक है, जो कि सूर्य की सतह के तापमान के बराबर है। यह गर्मी दो मुख्य कारणों से है। पृथ्वी की गहराई में मौजूद यूरेनियम और थोरियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों का लगातार टूटना। पृथ्वी की गहराई में मौजूद यह भयंकर गर्मी ऊपर की चट्टानों और भूमिगत पानी को गर्म कर देती है। कई बार यह गर्म पानी और भाप ‘गर्म पानी के झरनों’ के रूप में खुद ही धरती से बाहर आ जाते हैं। बिजली बनाने के लिए वैज्ञानिक और इंजीनियर इस प्रक्रिया का इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए जमीन में गहराई तक (कई किलोमीटर नीचे) कुएं खोदे जाते हैं।और वहाँ मौजूद तेज दबाव वाली गर्म भाप या पानी को पाइपों के जरिए सतह पर लाया जाता है।इससे इस तेज रफ्तार भाप से बड़े-बड़े टर्बाइन घुमाए जाते हैं। टर्बाइन के घूमने से उससे जुड़ा जनरेटर चलता है, जिससे बिजली बनती है।
यह पर्यावरण के अनुकूल है। इससे कोयले या पेट्रोलियम की तरह हानिकारक धुआँ या ग्रीनहाउस गैसें नहीं निकलतीं। सौर ऊर्जा (धूप) या पवन ऊर्जा (हवा) की तरह यह मौसम पर निर्भर नहीं है। यह साल के 365 दिन और 24 घंटे मिलती रहती है।भूतापीय बिजली संयंत्र (Power Plants) अन्य ऊर्जा संयंत्रों की तुलना में बहुत कम जमीन घेरते हैं।पर इसे हर जगह नहीं निकाला जा सकता। यह केवल उन्हीं इलाकों में संभव है जहाँ टेक्टोनिक प्लेट्स के किनारे हों या सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्र हों (जैसे आइसलैंड, न्यूजीलैंड और अमेरिका का कुछ हिस्सा)।भारत में भूमि के नीचे बहुत सारे भूतापीय (जियोथर्मल) संसाधन हैं, जिनमें कुछ ऐसी जगहें भी शामिल हैं जहां सतह के नीचे तापमान बिजली बनाने के लिहाज से काफी है। एक नई रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई।
एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में भूतापीय ऊर्जा के लिए काफी तकनीकी क्षमता है। रिपोर्ट में अनुमान व्यक्त किया गया है कि भूतापीय विकास से 3,50,000 से 7,00,000 नौकरियां पैदा हो सकती हैं, साथ ही कृषि उद्योग में आर्थिक गतिविधि को बढ़ावा मिल सकता है। सीईईडब्ल्यू में रणनीतिक साझेदारी के निदेशक कार्तिक गणेशन ने एक बयान में कहा, “जैसे-जैसे भारत की ऊर्जा आपूर्ति स्वच्छ स्रोतों की ओर बढ़ रही है, इस विविधता को नई प्रौद्योगिकी से पूरा करना होगा, और भूतापीय ऊर्जा वह हर जगह मिलने वाला स्रोत है जो ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी देता है, जिसका पर्यावरण पर बहुत कम असर पड़ता है और यह अल्पकालिक मौसम और दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन के उतार-चढ़ाव से प्रभावित नहीं होता।”
भारत में भूतापीय ऊर्जा का भविष्य बेहद आशाजनक और रणनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पारंपरिक रूप से भारत ने सौर और पवन ऊर्जा पर अधिक ध्यान केंद्रित किया है, लेकिन 2070 तक ‘नेट ज़ीरो’ कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने और चौबोसो घंटे स्वच्छ बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए भूतापीय ऊर्जा एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। हालिया रिपोर्टों, जैसे CEEW और प्रोजेक्ट इनरस्पेस के अध्ययन) के अनुसार, भारत के उपसतह में 450 गीगावाट बिजली उत्पादन, 11,000 गीगावाट औद्योगिक ताप और 1,500 गीगावाट से अधिक कूलिंग की तकनीकी क्षमता छिपी हुई है।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने देश में 300 से अधिक गर्म झरनों और कई प्रमुख भूतापीय क्षेत्रों की पहचान की है, जिन्हें 7 मुख्य बेसिनों में बांटा गया है। पुगा और चुमाथांग (लद्दाख) भारत का सबसे महत्वपूर्ण और उच्च तापमान वाला क्षेत्र है। यहाँ ओएनजीसी द्वारा 14,000 फीट की ऊंचाई पर भारत की पहली पायलट भूतापीय परियोजना पर काम किया जा रहा है।तातपानी (छत्तीसगढ़) में बिजली उत्पादन के लिए 25 मेगावाट के पायलट प्रोजेक्ट की योजना बनाई जा रही है। मणिकरण (हिमाचल प्रदेश): पर्यटन और स्थानीय हीटिंग के लिए प्रसिद्ध। इसके साथ ही पश्चिमी तट (महाराष्ट्र-गुजरात), नर्मदा-सोन सोनभद्र बेल्ट, गोदावरी बेसिन और महानदी बेसिन में भी इसकी बड़ी संभावना है। भूतापीय क्षेत्र को गति देने के लिए सरकार ने बड़े नीतिगत कदम उठाए हैं। सरकार ने देश के पहले समर्पित विनियामक ढांचे को अधिसूचित किया है। इसके तहत अन्वेषण जोखिमों को कम करने, निजी क्षेत्र को आकर्षित करने और तेल व गैस क्षेत्र के बंद पड़े कुओं को भूतापीय ऊर्जा के लिए पुन: उपयोग करने का रोडमैप तैयार किया गया है। इस नीति के तहत अनुसंधान और विकास के लिए सरकारी संस्थानों को 100% तक और निजी स्टार्टअप्स को 70% तक की वित्तीय सहायता दी जा रही है।
सौर और पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर करते हैं, जबकि भूतापीय ऊर्जा बिना रुके साल के 365 दिन और 24 घंटे लगातार बिजली प्रदान कर सकती है। एक अनुमान के अनुसार, बड़े पैमाने पर भूतापीय परियोजनाओं के विकास से देश में लगभग 7,00,000 नौकरियां पैदा हो सकती हैं।
भूतापीय पानी से लिथियम, सिलिका, बोरेक्स और सीज़ियम जैसे मूल्यवान खनिजों को निकाला जा सकता है, जो भारत की ईवी और इलेक्ट्रॉनिक्स क्रांति के लिए बेहद जरूरी हैं।बिजली के अलावा इसका उपयोग कोल्ड स्टोरेज (शीत गृह), ग्रीनहाउस कृषि, स्पेस हीटिंग (जैसे लद्दाख के ठंडे इलाकों में घरों को गर्म रखना) और औद्योगिक हीटिंग में सीधे किया जा सकता है।
पर इसमें उज्ज्वल भविष्य के बावजूद, कुछ बड़ी चुनौतियाँ हैं जिन्हें पार करना होगा। शुरुआती अन्वेषण और गहरी ड्रिलिंग में बहुत अधिक खर्च आता है, और सफलता की गारंटी अनिश्चित होती है।भारत में अभी गहरे स्तर पर ड्रिलिंग और कम तापमान वाले स्रोतों से बिजली बनाने की स्वदेशी तकनीक शुरुआती चरण में है।पुगा जैसी उच्च क्षमता वाली जगहें अत्यंत दुर्गम और ठंडे इलाकों में हैं, जहाँ बुनियादी ढांचा पहुंचाना मुश्किल है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि सही निवेश और नीतिगत सहयोग मिलने पर भारत की भूतापीय बिजली क्षमता 2035 तक 4.2 गीगावाट और 2045 तक लगभग 100 गीगावाट तक पहुंच सकती है। संक्षेप में कहें, तो भारत में भूतापीय ऊर्जा का भविष्य अब सिर्फ कागजों या गर्म झरनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का एक मजबूत स्तंभ बनने की ओर अग्रसर है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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