अर्जुन देशप्रेमी
विपक्ष के नेता राहुल गाँधी के द्वारा चुनाव आयोग पर लगाये गए आरोपों के बाद जिस अंदाज़ में चुनाव आयोग ने पलट वार किया है उसके बाद एक स्वाभाविक सा प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि राहुल गाँधी और पूरा विपक्ष अगर अपने आरोपों से पीछे नहीं हटता है और चुनाव आयोग अपने रुख पर कायम रहता है तो भविष्य में होगा क्या? इस पूरे प्रकरण में लोकतंत्र का क्या होगा? देश का क्या होगा? देश किस दिशा में बढ़ रहा है और उपरोक्त स्थितियों में देश का भविष्य कैसे निर्धारित होगा?
कछ लोग, विचारक, पत्रकार, बुद्धिजीवी कह सकते हैं कि इन सब प्रश्नों पर विचार का अभी उचित समय नहीं आया है. पर सच यह है कि अभी से इसपर विचार जरूरी है जिससे भविष्य में आने वाले किसी भी संकट का हल समय रहते खोजा जा सके. दरअसल लोकतंत्र में जितना महत्व संविधान का है उतना ही संवैधानिक संस्थाओं का है. इस लिहाज से चुनाव आयोग की बेदाग और निष्पक्ष छवि लोकतंत्र की मजबूती के लिए बेहद जरूरी है. पर दुर्भाग्य यह है कि देश में पूरा विपक्ष जिस तरह से व्यवहार कर रहा है और प्रश्न उठा रहा है, उसमे ऐसा लगने लगा है कि उनको चुनाव आयोग पर किसी तरह का विश्वास है ही नहीं. चुनाव आयोग के तमाम जवाबों के बाद भी विपक्ष, खासकर राहुल गाँधी और उनकी पार्टी चुनाव आयोग को ही वोट चोर कहने से बाज नहीं आ रहे हैं. इधर चुनाव आयोग ने अल्टीमेटम जारी कर दिया है कि राहुल गाँधी 7 दिन में माफी मांगे या हलफनामा दें. दूसरा कोई विकल्प नहीं है. इसके बाद विपक्ष और हमलावर हो गया है और साफ दिख रहा है कि राहुल गाँधी न तो हलफनामा देंगे न ही माफी मांगेंगे. अगर राहुल गाँधी और उनके साथ विपक्ष ऐसा नहीं करते हैं तो चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का क्या होगा? क्या इससे चुनाव आयोग को लेकर लोगों के मन में भ्रम या अविश्वास पैदा नहीं होगा? ऐसे में होगा क्या? क्या चुनाव आयोग चुप्पी साधकर बैठ जाएगा या कोई कानूनी कदम उठाएगा? क्या राहुल गाँधी के खिलाफ मुकदमे दर्ज करेगा या कराएगा?
इन प्रश्नों के उत्तर के साथ सवाल उठता है कि अगर राहुल गाँधी के खिलाफ चुनाव आयोग कोई हलके कदम उठाता है तो राहुल गाँधी एंड पार्टी अपने को शहीद बताकर लोगों में सहानुभूति के लिए आन्दोलन खड़ा करेगी और उसका फायदा उठाएगी. और यदि आयोग कोई कड़े कदम उठाता है तो संभव है पूरा विपक्ष चुनाव आयोग के खिलाफ सड़कों पर उतरकर देश को हिंसा, विद्रोह, गृहयुद्ध में झोंकने जैसा काम शुरू कर दे. यह भी संभव है कि विपक्ष देश में चुनावों का बहिष्कार ही कर दे. यह दोनों ही स्थितियां देश के लिए खतरनाक हैं. पर इसके साथ ही समस्या तब और विकराल हो जाएगी. अगर ऐसा होता है तब देश में होगा क्या? क्या देश बांग्लादेश को नहीं दोहरा रहा होगा ? क्या तब देश का लोकतंत्र छिन्न भिन्न नहीं हो जायेगा? क्या देश को यह मंज़ूर होगा? फिर इससे बचने का उपाय क्या है?
एक उपाय है कि सभी चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त राहुल गाँधी और विपक्ष के आरोपों को मान ले और इस्तीफा दे दें. कह दें कि यदि हम गलत हैं तो आप सही आदमी को ले आइये. ऐसे में फिर क्या होगा? सरकार या कानूनों के हिसाब से जिसे भी अगला चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया जायेगा, उसपर राहुल गाँधी मान जायेगे? क्या गारंटी है कि उसे भी ये भाजपा का आदमी नहीं बताएँगे? फिर तो यह अंतहीन सिलसिला बन जायेगा जबतक की उनकी मर्जी के आदमी को चुनाव आयुक्त न बना दिया जाये. अगर उनके हिसाब से या उनके चहेते या उनकी पसंद से चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त को चुना जायेगा तो फिर उसपर भाजपा और उसके सहयोगी दल कैसे राजी होंगे? तो फिर चुनाव आयोग बचेगा कैसे? चूँकि राहुल गाँधी और विपक्ष का तो आरोप ही है कि चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त ही गड़बड़ है, तो फिर जब इनकी नियुक्ति ही नहीं हो पायेगी तो देश में चुनाव कराएगा कौन? और चुनाव होंगे ही नहीं, या उनकी विश्वसनीयता ही नहीं बचेगी, तो देश में लोकतंत्र बचेगा कैसे?
कुछ लोग कहेंगे कि सुप्रीम कोर्ट को यह काम दे दिया जाये. या तो वही चुनाव कराये या वही चुनावों की निगरानी करे. इस सुझाव में दम तो है, पर क्या ऐसे में परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से देश में सुप्रीम कोर्ट ही “भारत भाग्य विधाता” नहीं बन जायेगा? और मान लीजिये सुप्रीम कोर्ट ही चुनाव कराये और उसमें जो हारे, वह आरोप लगाने लगे कि सुप्रीम कोर्ट ही “वोट चोर” है, तो फिर क्या होगा? वैसे भी राहुल गाँधी और विपक्ष सुप्रीम कोर्ट के हर उस फैसले पर सवाल उठाता है जो उसके खिलाफ जाता है. ऐसे में क्या कोई इस बात की गारंटी ले सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा कराये गए चुनाव के परिणामों पर राहुल गाँधी और उनके सहयोगी सवाल नहीं उठाएंगे? महाराष्ट्र के चुनावों पर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने ही अपने फैसलों से बता दिया कि वहां चुनावों में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है. वाबजूद इसके विपक्ष कह रहा है कि वहां वोट चोरी से भाजपा जीती. यदि ऐसा हुआ तो फिर इस देश में लोकतंत्र का होगा क्या, यह सवाल फिर सामने आ जाता है. एक प्रश्न यह भी है कि अगर गलती से भी भाजपा चुनाव हारने लगी तो क्या वह ठीक उसी तरह के आरोप नहीं लगाने लगेगी जैसा कि राहुल गाँधी और कांग्रेस के साथ विपक्ष लगा रहा है.
होना तो यह चाहिए था कि अगर चुनावों में कोई गड़बड़ी हुई है तो उसके खिलाफ राहुल गाँधी, कांग्रेस पार्टी समेत विपक्ष को चुनाव आयोग के खिलाफ मुकदमा करना चाहिए था. वहां साबित करना चाहिए कि चुनाव आयोग चोर है. उसने भाजपा के साथ मिलकर वोट चोरी की है, कराई है. पर ऐसा लगता है कि विपक्ष को सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा नहीं है. इसी कारण से वह सीधे सीधे संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ ही हल्ला बोल रहे है. पर ऐसा करते हुए विपक्ष भूल जा रहा है कि वह देश के खिलाफ एक ऐसा काम कर रहा है, जिसकी परिणति बहुत ही खतरनाक होगी.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)