• बिहार के चाणक्य यानि नीतीश कुमार पिछले 2020 के विधानसभा में संख्या बल के मामले में भले ही गच्चा खा गए थे और उनकी पार्टी जदयू हाफ सेंचुरी (50) का भी आंकड़ा नहीं छू पाई थी लेकिन इस बार फिर से पुराने रोल यानि बड़े भाई के रोल में आने की तैयारी है। इसके लिए ब्लू प्रिंट तैयार कर उस पर अमल करना भी शुरू कर दिया गया है।

  • बिहार : ऐसे फिर से बड़ा भाई बनेगा जदयू

  • बिहार का चाणक्य क्या फिर से बनेगा बड़ा भाई !

कुमार समीर
बिहार चुनाव की ना तो अभी आधिकारिक घोषणा हुई है और ना ही एनडीए के घटक दलों के बीच सीटों का बंटवारा हुआ है लेकिन पार्टियां अपने अपने तरीके से गुणा भाग में जुट गई है। इस कड़ी में अभी हम सब सत्तासीन जदयू पर बात करेंगे कि आखिर किस तरह वह अपने पहले वाले बड़े भाई वाले रोल में आने की तैयारी कर रही है।
जदयू के बनाए इस ब्लूप्रिंट में पिछले 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में
चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा के कारण हारी हुई लगभग 50 सीटों पर फोकस किया गया है। 2020 के चुनाव में चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा दोनों की पार्टियों ने जदयू के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे थे और जदयू को हराने में अहम भूमिका अदा की थी। हालांकि भले ही इनके प्रत्याशियों को ज्यादातर जगहों पर हार का सामना करना पड़ा था लेकिन नीतीश कुमार की पार्टी जदयू जितने वोट से हारी थी उससे कहीं ज्यादा वोट पासवान और कुशवाहा के प्रत्याशियों ने हासिल किए थे। दोनों ने जदयू के आधार वोट में सेंधमारी की थी। इससे जदयू को नुकसान हुआ था। ऐसी सीटों की संख्या लगभग 50 है। लेकिन इन सबों के इस बार एनडीए में रहने के कारण इस बार स्थिति पिछले चुनाव के मुकाबले उलट है।
इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि पासवान और कुशवाहा दोनों की पार्टियां क्रमशः लोजपा व रालोसपा भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए के घटक दल हैं जिनमें नीतीश कुमार की पार्टी जदयू भी शामिल है। इसलिए पासवान व कुशवाहा के द्वारा प्रत्याशियों को अलग से उतारे जाने की संभावना नहीं के बराबर है।
इसी समीकरण को ध्यान में रखकर जदयू ने अपनी 50 विधानसभा सीटों के लिए खास रणनीति बनायी है। इन सीटों को जीतने के लिए पार्टी ने सभी पदाधिकारियों व प्रकोष्ठों को बड़ी जिम्मेवारी सौंपी है। पार्टी ने कई स्तरों पर समीक्षा के बाद इन सीटों की पहचान की है।
इसके बाद ही प्रदेश पदाधिकारियों को टास्क सौंपा गया है। बताते चलें कि
पिछले दिनों पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा व प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने संगठन की बैठक में सभी सीटों को लेकर प्रदेश पदाधिकारियों को टास्क सौंपा। इसके बाद प्रदेश कमेटी ने उन सीटों की पहचान शुरू की। पार्टी ने हर बूथ पर 10-10 लोगों को तैयार करने की योजना पर काम किया, लेकिन बाद में इसका स्वत: विस्तार हो गया। पार्टी का दावा है कि हर बूथ पर उसने लक्ष्य से अधिक लोग तैयार किये हैं। हर प्रकोष्ठ की अपनी तैयारी है ताकि एनडीए जीत सुनिश्चित की जाए।
बूथ मैनेजमेंट पर प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि हमने कुछ सीटों की पहचान कर वहां अधिक ध्यान देने की योजना बनायी है। पार्टी कार्यकर्ताओं को कई जिम्मेवारी दी गयी है। यहां बूथ मैनेजमेंट पर सर्वाधिक ध्यान दिया जा रहा है। बूथ के हर लोगों से संपर्क किया जा रहा है। यहां पार्टी कार्यकर्ताओं को मतदाताओं से बेहतर समन्वय स्थापित कर काम करने को कहा गया है।
वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय कुमार चौधरी कहते हैं कि पिछला विधानसभा चुनाव अब हमारे लिए बीती बात है। हम आगे बढ़ चुके हैं। पार्टी हर सीट पर मेहनत कर रही है। कुछ सीटों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है और हम ऐसा कर भी रहे हैं। इस बार सहयोगी दलों के साथ एनडीए एकजुट है। कहीं कोई दिक्कत नहीं, कोई विवाद नहीं। सब मिलकर लड़ेंगे। हमारी सम्मिलित मेहनत का लाभ पूरे एनडीए को होगा। परिणाम एनडीए के पक्ष में होगा।
बता दें कि जदयू के वरिष्ठ नेता द्वारा यह कहना बीती बातों को याद करने की नहीं भूलने की जरूरत है क्योंकि इस बार सहयोगी दलों के साथ एनडीए एकजुट है, कहीं कोई विवाद नहीं है । सम्मिलित मेहनत एनडीए को कामयाब बनाएगा।
जदयू नेता भले ही इस समय पुरानी बातों को भूलने की बात कर रहे हैं लेकिन सच्चाई यही है कि पिछले चुनाव में जिस तरह का घाव चिराग पासवान व उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार को दिया था वह जदयू को इस पूरे पांच साल के कार्यकाल के दौरान सालता रहा। बड़े भाई का दंभ भरने वाले को छोटा भाई बनाकर बौना तो कर ही दिया गया। अब देखते हैं इस बार क्या होता है? पिछली बार की तरह कहीं चिराग पासवान एनडीए में रहते हुए अपने प्रत्याशी अलग से तो नहीं उतारते हैं। अगर चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा दोनों अगर अलग से अपने अपने प्रत्याशी नहीं उतारते हैं तो निःसंदेह इस बार नीतीश कुमार की अगुवाई वाली पार्टी जदयू का प्रदर्शन 2025 के नवगठित विधानसभा में बेहतर रहेगा। वैसे घटक दल अधिक से अधिक सीटों पर टिकट पाने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है। लोजपा (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने जहां लोकसभा चुनाव के स्ट्राइक रेट को आधार मानकर विधानसभा की टिकटें दिए जाने की मांग करनी शुरू कर दी है वहीं हम पार्टी प्रमुख व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने भी 2020 से कहीं ज्यादा सीटें मांगनी शुरू कर दी है। वैसे कहा जा रहा है कि हाल में नीतीश कुमार और अमित शाह के बीच बिहार में हुई मुलाकात में एनडीए के घटक दलों की सीटों का खाका तैयार कर लिया गया है।
जानकारी के अनुसार बिहार विधानसभा के कुल 243 सीटों में से जदयू 102-103, भाजपा 101-102, लोजपा 25-28, हम 6-7 और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएम को 4-5 सीटें देने की सहमति बनी है जबकि पिछले लोकसभा चुनाव (सभी पांचों कंडीडेट जीते थे ) में 100 फीसदी स्ट्राइक रेट को आधार बनाकर लोजपा 30-40, मांझी की पार्टी 15 सीटें और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी 8-10 सीटें मांग रही है। सबकी नजर चिराग पासवान पर है और वह ज्यादा दबाव नहीं बना सकें इसलिए उनके सौ फीसदी स्ट्राइक रेट की काट के लिए यह मैसेज दिया जाने लगा है कि पिछले 2020 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी लोजपा को केवल एक सीट मिली थी इसलिए उन्हें जितनी सीटें दी जा रहीं हैं वह उनके पिछले विधानसभा चुनाव परिणाम के हिसाब से काफी ज्यादा है। अब देखना है कि चिराग दबाव बनाकर कितनी और अधिक सीटें अपने खेमे में ला पाते हैं या फिर कोई नया गुल खिलाते हैं जिसकी संभावना इस बार फिलहाल तो नहीं दिख रही है।

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