पश्चिम बंगाल में अभी चुनाव होने में एक साल है ,लेकिन जिस तरह से बिहार चुनाव के रिजल्ट के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में पश्चिम बंगाल का नाम क्या लिया अब चर्चा पश्चिमी बंगाल की छिड़ गई है सबसे बड़ा सवाल यही है , भाजपा इसके लिए कितना तैयार है, भजपा के लिए बिहार विजय का समीकरण पश्चिम बंगाल के राजनीतिक समीकरण से कितना मेल खाता है।
विजय मिश्र
बिहार विधानसभा चुनाव के बाद कई राज्यों में चुनाव होने हैं । उन राज्यों के लिए बीजेपी ने अपने राजनीतिक आधार के मजबूत होने का दावा करना शुरू कर दिया है. बिहार चुनाव के बाद प्रधानमंत्री का इशारा मिलते ही भारतीय जनता पार्टी के नेता अब पश्चिम बंगाल जीतने का दावा कर रहे हैं. बिहार में जिस तरह के चुनाव परिणाम आए हैं वह भारतीय जनता पार्टी के लिए नई रणनीति का नया स्वरूप जरूर खड़ा कर रहे हैं. यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी 2026 के मार्च अप्रैल महीने में होने वाले पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर अभी से जीत का दावा करना शुरू कर चुकी है।
लंबे समय से इंतजार कर रही भाजपा का इस बार बिहार विजय चुनाव ने कई नए राजनीतिक समीकरण गढ़ दिए अब तक राजनीतिक समीक्षक इस बात को मानते रहे थे कि देश में जो शहरी विधानसभा सीटे हैं उनको बीजेपी आसानी से जीत लेती है. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अभी बीजेपी की उतनी मजबूत पकड़ नहीं है. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड ने गठबंधन के नए आधार को खड़ा कर दिया. बिहार में जिस वोट बैंक पर परंपरागत वोट बैंक की बात होती थी वो दावा भी टूट गया।
उदाहरण के तौर पर देखे तो इस बार बिहार कब शहरी क्षेत्र के तीस में 29 सीट जीती , सेमी अर्बन में 12 सीट में 8 सीट पर जीत हासिल हुई, वही 201 ग्रामीण सीट में 167 सीट एनडीए के खाते में गई। कुल 243 में 202 सीट एनडीए के खाते में रही । और सबसे खास बात यह जेडीयू के साथ रहने के कारण उन सीट पर भी जीत मिली जिसमे जातीय समीकरण में मुस्लिम वोटर थे , आंकड़ो की बात करे तो पसमांदा समाज के करीब 5 प्रतिशत वोट भी इस बार एनडीए के खाते में रहा तो वही सामान्य मुसलमान के भी 5 प्रतिशत से ज्यादा वोट एनडीए खिंचने में सफल रही जिसका श्रेय नीतीश का साथ रहना बताया गया। अब बात करते है पश्चिम बंगाल का बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच चल रही चुनावी लड़ाई ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को एक चुनावी जंग में तब्दील कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी में से किसका पलड़ा भारी यह तो 2026 के चुनाव ही बताएंगे लेकिन जो चुनावी समीकरण इससे पहले रहे उसकी बात करते है।
बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच चल रही चुनावी लड़ाई ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को एक चुनावी जंग में तब्दील कर दिया है। एक तरफ़ जहाँ बीजेपी की तरफ़ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी अपनी पूरी ताक़त झोंकने की बात कह रही है तो , वहीं दूसरी ओर टीएमसी की सबसे जुझारू नेता ममता बनर्जी ने अपनी रणनीति के सहारे अपनी सत्ता बरकरार रखने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं।
अब सवाल है क्या बंग की जंग में बीजेपी टीएमसी के क़िले में सेंध लगा पाएगी या सिर्फ़ हवा बनाने की कोशिश कर रही है और क्या अंत में तृणमूल कांग्रेस की ही बड़ी जीत होने वाली है?
कई ऐसे पहलू हैं जिससे ऐसा लगता है कि बीजेपी के लिए बंगाल चुनाव उतना आसान नहीं होने जा रहा है। आइए, बारी-बारी से विश्लेषण करते हैं- पिछले चुनाव की बात करे तो भाजपा की ध्रुवीकरण की राजनीति यहाँ पर फेल हो गई थी आपको बता दे
पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में सीएए लागू करने का वादा कर साफ़ कर दिया है कि वह राज्य में अपने एजेंडे पर पूरी तरह क़ायम है और उसमें कोई बदलाव नहीं आया है।
इस बार भी पार्टी के चुनाव प्रचारक भी अपने अभियान में इस पर जोर दे रहे हैं। पर बीजेपी का ब्रह्मास्त्र (ध्रुवीकरण) अब तक यहाँ पर ज़मीनी स्तर पर उतना कारगर होता नहीं दिख रहा है जितना बीजेपी के थिंक टैंक को उम्मीद है।
कुछ क्षेत्रों को छोड़ दें (मुर्शिदाबाद, मालदा, ब्रह्मपुर, हुगली) तो मुसलमान तबक़े का समर्थन ममता बनर्जी को एकतरफ़ा मिलता हुआ दिख रहा है। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण नंदीग्राम है जहाँ ममता को मुसलमान तबक़े का मत एकतरफ़ा मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ हिंदू तबक़े में विभाजन साफ़ देखा जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि अभी भी स्थानीय बंगालियों में ममता के प्रति झुकाव बना हुआ है। वही दूसरा सबसे बड़ा कारण है विपक्षी दलों का ममता को सहयोग मिलना आपने देखा होगा।
कांग्रेस और लेफ्ट उसी क्षेत्रों में ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जहाँ उन्हें जीतने की उम्मीद सबसे ज़्यादा है। कांग्रेस नहीं चाहती है कि उसके कारण ममता के मतों में विभाजन हो, खासकर अल्पसंख्यक तबक़े का, और इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि राहुल गांधी या कांग्रेस के किसी भी बड़े राष्ट्रीय नेताओं का बंगाल की तरफ रुख न करना। यह साफ दिख है कि कांग्रेस ने पिछले चुनाव में अधीर रंजन चौधरी, गनी खान चौधरी के सहारे मालदा, मुर्शिदाबाद ब्रह्मपुर और दिनाजपुर तक अपने आप को सीमित कर रखा है। जबकि हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस अभी भी बंगाल में मुख्य विपक्षी पार्टी है जिनके 44 विधायक हैं।
वही भाजपा की बात करे तो ज्यादातर चुनाव में वह बगैर कप्तान के ही चुनाव में उतरती है , फिर वह चाहे मध्यप्रदेश हो या फिर राजस्थान जहाँ उन्हें भारी सफलता भी मिली लेकिन वही बात पश्चिम बंगाल में खतरा बन जाता है , यहाँ पर बीजेपी के लिए मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित न करना सबसे बड़ा नकारात्मक फ़ैक्टर साबित हो जाता है।
यदि बीजेपी के पास ममता के मुक़ाबले कोई लोकप्रिय चेहरा होता तो मुक़ाबला और दिलचस्प होने की संभावना रहती । बंगाल के लोगों के मानस में यह बात है कि ममता नहीं तो कौन? यह कौन ही भाजपा के लिए मुश्किल खड़ा करता है।
बंगाल की बात करे तो यहाँ पर बीजेपी का अंतरकलह किसी से छिपा हो ,बंगाल बीजेपी की अंदरूनी कलह पार्टी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द साबित होता दिख रहा है। पिछली बार पार्टी ने टीएमसी से आए क़रीब 150 नेताओं को इ टिकट दिया है जिससे पुराने कार्यकर्ताओं में रोष कायम रहा जो साफ तौर पर देखने को मिला।
वही अन्य राज्यो के मुकाबले यहाँ पर भाजपा का संगठन उतना मजबूत नही है , उत्तरी बंगाल की तुलना में बीजेपी दक्षिण बंगाल में अभी भी संगठनात्मक रूप से बहुत कमजोर है। 2019 लोकसभा चुनाव के परिणाम को भी देखेंगे तो दक्षिण बंगाल में बीजेपी का प्रदर्शन उतना बेहतर नहीं था जितना उत्तर बंगाल में। क़रीब 60 से 65 फ़ीसदी विधानसभा क्षेत्र दक्षिण बंगाल से आते हैं और वहाँ टीएमसी अभी भी अपनी पैठ बनाए हुए है। यदि बीजेपी दक्षिण के क़िले को फतह कर पाती है तो फिर परिणाम बीजेपी के पक्ष में हो सकते हैं।
देखा जाय तो बिहार चुनाव के बाद भाजपा ने पश्चिम बंगाल के लिए अपनी चुनावी बिगुल फूंक दी है , लेकिन यहाँ जीत हासिल करना उतना सरल नही है ,क्योकि जो जातीय समीकरण अन्य राज्यो में है वह पश्चिम बंगाल में नही है वही बाहर से आये नेता और संगठन का पूरी तरह से प्रदेश में स्थापित न हो पाना इससे भी भाजपा को पार पाना होगा हालांकि अगर बंगाल के समीकरण में भाजपा के पक्ष की बात करे तो S I R लागू होना जरूर वोट के समिकरण को बदलेगा।