९ मई: गोपाल कृष्ण गोखले जयंती पर विशेष

सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म ९ मई १८६६ को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के कोटलुक (या कोहट) गाँव में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता कृष्ण राव किसान थे, किंतु खराब मिट्टी के कारण क्लर्क का कार्य करने लगे, जबकि माता वालूबाई गृहिणी थीं। बड़े भाई की सहायता से उन्होंने कोथापुर के राजाराम हाई स्कूल में शिक्षा ग्रहण की और १८८४ में मुंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज से स्नातक बनकर उभरे। गोखले ने न्यू इंग्लिश स्कूल में शिक्षण आरंभ किया तथा १८८५ में पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज के संस्थापक सदस्य बने, जहाँ उन्होंने दो दशक समर्पित कर प्रधानाचार्य तक का पद पाया। अंग्रेजी, इतिहास और समाज सुधार के प्रति उनकी गहरी समझ ने उन्हें प्रभावी वक्ता बनाया। १९०५ में उन्होंने ‘सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी’ की स्थापना की, जो सार्वजनिक सेवा, शिक्षा और स्वदेशी के लिए युवाओं को समर्पित थी।
गोखले महादेव गोविंद रानाडे के शिष्य तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नरमपंथी नेता थे। उन्होंने स्वदेशी आंदोलन को देशभक्ति और आर्थिक प्रगति का माध्यम बताया, प्रतिक्रियावादी या हिंसक तरीकों को अस्वीकार किया। १८९९-१९०२ तक बॉम्बे विधानमंडल तथा १९०२-१५ तक साम्राज्यीय विधानमंडल में रहकर १९०९ के मॉर्ले-मिंटो सुधारों में भूमिका निभाई।
महात्मा गांधी गोखले को अपना राजनैतिक गुरु मानते थे, जो उनसे ढाई वर्ष बड़े थे। गांधीजी की पुस्तक ‘सत्य के प्रयोग’ में वर्णित एक घटना में गोखले ने ट्रेन यात्रा के बजाय घोड़ा-गाड़ी चुनकर जनता की सुविधा को प्राथमिकता दी।‌ गोखले का निधन १९ फरवरी १९१५ को हुआ, किंतु उनका संवैधानिक संघर्ष आज भी प्रासंगिक है। गोपाल कृष्ण गोखले का योगदान स्वतंत्रता, शिक्षा और समाज सुधार में अमूल्य है। उनकी जयंती हमें संयमित राष्ट्रवाद की प्रेरणा देती है।
एवीके न्यूज सर्विस

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