जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है।

राधारमण

जो भरा नहीं है भावों से , बहती जिसमें रसधार नहीं; वह ह्रदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने यह पंक्तियां किसी जाति-धर्म अथवा व्यक्ति विशेष को ध्यान में रखकर नहीं लिखी थीं।

ठीक उसी तरह चर्चित उपन्यास ‘आनन्दमठ’ में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदेमातरम् … का पद किसी को खुश या नाराज करने के लिए नहीं लिखा था। दोनों देश के दिग्गज साहित्यकार और माटी के लाल रहे हैं। दोनों के जन्म से पहले देश गुलाम था। अपनी माटी से मोह और आजादी का सपना दोनों ने देखा था। दोनों की कविताओं में राष्ट्रवाद कूट-कूटकर भरा था। लेकिन आजादी के 79 वर्ष बाद भी हम किस समाज में जी रहे हैं ? हमें अपने ही पुरखों की बातों, नीतियों, सोच और कविताओं से दिक्कत क्यों हो रही है ? हम क्यों भूल जाते हैं कि जिस देश को हम दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बताते नहीं अघाते, उसकी बुनियाद हमारे पुरखों ने ही रखी थी। हम हर चीज को राजनीतिक नजरिये से ही क्यों देखने के आदी होते जा रहे हैं।
हमारे देश के नेता जनता को हिन्दू-मुस्लिम की दरार में क्यों बांटने पर आमादा हैं ? क्या 140 करोड़ नागरिकों का यह देश महज मुट्ठीभर नेताओं का है ? क्या नेता समाज में कटुता बांटकर अपनी चुनावी गोटी फिट करने के लिए ही यह सब कर रहे हैं, जो देशहित में कत्तई नहीं है।
सत्ता में बैठे लोग तो बात का वितंडा बनाएंगे ही, क्योंकि उन्होंने देश की मूलभूत समस्याओं की उपेक्षा की है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, बेरोजगारी का बुरा हाल है। देश में बहुतेरे ऐसे लोग हैं जो दो जून की रोटी के मोहताज हैं। फिर भी हमारे नेता शर्मसार नहीं हैं। वे अपनी सुख-सुविधा और वेतन-भत्ते बढ़ाने में मिल-जुलकर भागीदार रहते हैं, लेकिन जनता की भलाई में एकमत नहीं होते।
अब ताजा विवाद राष्ट्रगीत के पूरे पदों के गायन को लेकर है। यह राष्ट्रगीत बांग्ला साहित्य के देदीप्यमान हस्ताक्षर बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के लोकप्रिय उपन्यास ‘आनन्दमठ’ से लिया गया है। ‘आनन्दमठ’ का प्रकाशन 1882 में किया गया था। जिसने भी ‘आनन्दमठ’ का अध्ययन किया है, उसे पता है कि ‘आनन्दमठ’ 1770 में बंगाल के अकाल और 1773 के संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर आधारित है। उपन्यास के मुताबिक अकाल के समय ईस्ट इंडिया कंपनी के गलत निर्णयों, नियमों और किसानों के शोषण से तत्कालीन सरकार के प्रति लोगों की नाराजगी बढ़ जाती है। उपन्यास की कथा के अनुसार सत्यानंद नामक संन्यासी के नेतृत्व में संन्यासियों की एक सेना का गठन होता है, जिसका उद्देश्य देश को अंग्रेजी कुशासन से मुक्त कराना है।
उसी उपन्यास में वंदेमातरम् शीर्षक से कविता की गूंज होती है। बाद में आजादी की लड़ाई में इस कविता ने अहम भूमिका निभायी। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वंदेमातरम् भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराने के लिए संघर्ष कर रहे स्वतंत्रता सेनानियों का नारा बन गया था। इस गीत में भारत माता की वंदना करते हुए उसकी सुंदरता, शक्ति और प्राकृतिक समृद्धि का गुणगान किया गया है।
चूंकि वंदेमातरम् का गायन करने वाले हिन्दू संन्यासी थे, इसलिए गीत में माता दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी से भारत माता की तुलना करते हैं। उसी उपन्यास के आखिर में एक अजनबी संत का पदार्पण होता है, जो सत्यानंद से कहते हैं कि देश में अंग्रेजी शासन इसलिए जरूरी था कि मुसलामानों के शासन का प्रभाव कम किया जा सके। बता देना जरूरी है कि अपने उपन्यास में अंग्रेजों की मुखालफत करने वाले बंकिम बाबू अंग्रेजों के शासन में बंगाल सरकार में सचिव पद पर तैनात रहे थे।
वंदेमातरम् एक संस्कृत वाक्यांश है, जिसका मतलब है- हे मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने मंच पर वंदे मातरम गाया। यह पहला मौका था जब यह गीत सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर गाया गया। सभा में मौजूद हजारों लोगों की आंखें नम हो गई थीं। ‘द नेहरू आर्काइव’ के मुताबिक, 26 अक्टूबर से 1 नवंबर 1937 के बीच कांग्रेस वर्किंग कमेटी की कलकत्ता बैठक हुई। इसमें तय किया गया कि राष्ट्रीय कार्यक्रमों में वंदेमातरम् के सिर्फ पहले 2 छंद गाए जाएं, क्योंकि बाद के हिस्सों में धार्मिक और देवी-देवताओं से जुड़े संदर्भ थे, जिन पर कुछ मुस्लिम नेताओं को आपत्ति थी। 24 अक्टूबर 1950 को इसके पहले अंतरे को राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता दी गई थी।
अब इस साल केन्द्रीय सरकार ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक 2026 लाकर इस पूरे गीत को राष्ट्रगान से साथ गाना अनिवार्य कर दिया है। साथ ही इसे रोकने को दंडनीय अपराध बना दिया है। यह बिल लोकसभा में 29 जुलाई को और राज्यसभा में 30 जुलाई को बिना चर्चा के पारित किया गया। राष्ट्रपति ने भी इस बिल को मंजूरी दे दी है। सवाल उठता है कि अगर यह विधेयक इतना ही जरूरी था तो सरकार अपने कार्यकाल के 12 वर्ष में इसे लेकर क्यों आई। और, अगर लाई तो संसद के दोनों सदनों में इस पर विस्तार से चर्चा करानी चाहिए थी। दूसरी तरफ विपक्ष खासकर कांग्रेस को इसे संसद में ही रोकने का प्रयास करना चाहिए था। अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद इसमें किन्तु-परन्तु का क्या मतलब है।
दरअसल, आनेवाले दिनों में सात राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इस बीच पेपरलीक, बेरोजगारी और स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं की कमी के खिलाफ छात्रों और युवाओं का बड़ा वर्ग आंदोलन कर रहा है। बढ़ती महंगाई से जनता बेजार है।
सरकारी नौकरियों में अकेले केंद्र सरकार में 8 लाख से अधिक पद खाली हैं, जिसे भरने का सरकार की ओर से कोई रोडमैप नहीं दिखाई दे रहा है। पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट से उद्धमी और आम लोग दुखी हैं। अगड़ी जाति के युवा आर्थिक आधार पर आरक्षण और यूजीसी के नए नियमन के खिलाफ गोलबंद हो रहे हैं।
अयोध्या के राममंदिर में चढ़ावा चोरी से सरकार की साख गिरी है, क्योंकि राममंदिर क्षेत्र तीर्थ ट्रस्ट का गठन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार ने ही किया था। विपक्ष जनता के मुद्दों को हवा दे रहा है। ऐसे में समस्याओं से चौतरफा घिरी सरकार के समक्ष धार्मिक आधार पर विभाजन के सिवाय बचने का कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा है।
बेशक, राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का गायन हर देशवासी का नैतिक कर्तव्य है। लेकिन नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं मुहैय्या कराना भी सरकार का दायित्व है। अपना देश धर्मनिरपेक्ष है। यहां के सभी नागरिकों को अपने धर्म के अनुसार इबादत की आजादी है। राष्ट्रगीत का गायन अच्छी बात है, लेकिन इसे डंडे की जोर पर गाने का कोई औचित्य नहीं है। पिछले दिनों देश ने देखा कि एक राज्य के विधानसभा अध्यक्ष राष्ट्रगान के बीच ही कैसे उठकर चल दिए। क्या ही अच्छा होता कि सरकार समाज में ऐसी खुशहाली लाती कि लोग स्वेच्छा से इसके लिए प्रेरित होते। सिर्फ ध्यान बांटने के लिए राष्ट्रगीत का शिगूफा छोड़ना ठीक नहीं है।

लेखक वरिष्ठ संपादक हैं

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