एच-वन-बी वीज़ा विवाद भारत के सामने दोहरी चुनौती पेश करता है। एक ओर लाखों प्रवासी भारतीयों की आजीविका और भविष्य की चिंता है, तो दूसरी ओर यही संकट भारत के लिए सुनहरा अवसर भी है। यदि भारत इस अवसर का लाभ उठाकर रिवर्स ब्रेन ड्रेन को अपनी ताकत बना लेता है तो आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को नई दिशा और ऊर्जा मिलेगी। संकट हमें यह याद दिलाता है कि आत्मनिर्भरता केवल नारे से नहीं बल्कि दूरदर्शी नीतियों और वैश्विक अवसरों को साधने की क्षमता से संभव है।
कुमार समीर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बारे में अब लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि वह चौबे गए छब्बे बनने, दुब्बे बन घर लौटने वाले हैं। जी हां , ट्रम्प बुरी तरह फंस गए हैं। उनके सलाहकारों ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है। सलाहकारों ने अमेरिका के अंदर अमेरिकियों से खूब वाहवाही मिलेगी यह सोचकर एच-1 बी वीज़ा का जो नया फरमान उनकी तरफ से जारी करवाया गया गया, वह अब सेल्फ गोल जैसा होता दिख रहा है। कंफ्यूजन का आलम यह है कि ह्वाइट हाऊस की तरफ से लगभग रोजाना स्पष्टीकरण जारी किए जा रहे हैं लेकिन फिर भी कंफ्यूजन दूर नहीं हो पा रहा है।
वहीं अमेरिकियों को भी लगने लगा है कि यह उनके लिए आत्मघाती घाव जैसा है। यही वजह है कि ट्रंप के फैसले का अमेरिका में ही विरोध शुरू हो गया है।कैलिफोर्निया की डेमोक्रेट सांसद सिडनी कैमलेगर-डोव ने एच-1 बी वीजा शुल्क एकमुश्त बढाए जाने को अमेरिका की प्रतिस्पर्धा को खत्म करने वाला और भारत-अमेरिका रिश्तों को नुकसान पहुंचाने वाला बताया है। डेमोक्रेटिक सांसद ने चेतावनी देते हुए कहा है कि यह कदम “अमेरिकी प्रतिस्पर्धा को तबाह कर देगा, अमेरिकी व्यवसायों को चोट पहुंचाएगा और अमेरिका-भारत संबंधों को और नुकसान पहुंचाएगा.”
कैलिफोर्निया की डेमोक्रेट सांसद के मुताबिक राष्ट्रपति अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कीमत पर आप्रवासियों और वैश्विक प्रतिभा को निशाना बना रहे हैं। उन्होंने कहा, “अमेरिकी श्रमिक ट्रंप की बढ़ती बेरोजगारी और मुद्रास्फीति से पीड़ित हैं। वह हानिकारक और ज़ेनोफोबिक नीतियों के बजाय इसे ठीक क्यों नहीं करते?” कैमलेगर-डव के मुताबिक यह नीति न केवल विदेशी प्रतिभाओं के लिए हानिकारक है बल्कि अमेरिकी कंपनियों और विश्वविद्यालयों के लिए भी नुकसानदेह होगी, जो सालों से इस प्रोग्राम पर निर्भर हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति ट्रंप “इमिग्रेंट्स और ग्लोबल टैलेंट” को निशाना बनाकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और इनोवेशन को चोट पहुंचा रहे हैं।
याद रहे कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल से पहले राष्ट्रपति रहे बाइडेन के युग का H-1B कार्यक्रम अमेरिकी टेक कंपनियों और विश्वविद्यालयों के लिए विदेशों से उच्च कुशल श्रमिकों को लाने के लिए एक जीवनरेखा रहा है। इस कार्यक्रम के आवेदकों में भारत सबसे बड़ा स्रोत है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस भारी भरकम शुल्क से भारत समेत अन्य देशों के तकनीकी और शोध प्रतिभाओं का रुख दूसरे बाज़ारों की ओर हो सकता है।
कमालगर-डव के मुताबिक यह नीति सिर्फ विदेशी श्रमिकों को नहीं, बल्कि अमेरिकी कंपनियों को भी नुकसान पहुंचाएगी जो उनकी विशेषज्ञता पर निर्भर हैं। उन्होंने कहा, “यह एक आत्मघाती घाव है जो अमेरिकी आर्थिक नेतृत्व को कमजोर करता है। वहीं
‘अमेरिकन इमिग्रेशन लॉयर्स एसोसिएशन’ (AILA) के अध्यक्ष जेफ जोसेफ ने भी ट्रंप की नई वीजा नीति की निंदा करते हुए इसे “असंवेदनशील और क्रूर” बताया है। उनके अनुसार इस कदम से न केवल तकनीकी क्षेत्र, बल्कि छोटे व्यवसायों सहित अन्य उद्योगों को भी नुकसान होगा, जिन्हें महत्वपूर्ण श्रमिकों की आवश्यकता है।
डोनाल्ड ट्रंप के काम करने के तरीको पर भी सवाल उठाए जा रहे है।उन्होने जिस तरह अचानक स्किल्ड वर्कर्स के परमिट की लागत 50 गुना बढ़ाकर 1 लाख डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) करने का एलान किया, उससे अफरा-तफरी मच गई। पहले घबराहट, अफरा-तफरी और फिर व्हाइट हाउस की सफ़ाई. एच-1बी वीज़ा पर अमेरिका में काम करने वाले लाखों भारतीयों के लिए परेशान करने वाला रहा। सिलिकॉन वैली की कंपनियों ने अपने कर्मचारियों से कहा कि वे देश से बाहर न जाएं। विदेशों में काम करने वाले लोग तुरंत फ़्लाइट्स खोजने लगे और इमीग्रेशन वकील आदेश को समझने में जुट गए। हालात खराब होने पर व्हाइट हाउस ने माहौल शांत करने की कोशिश की और साफ़ किया कि यह फ़ीस सिर्फ़ नए आवेदकों पर लागू होगी और एक बार ही देनी होगी। इसके बावजूद, लंबे समय से चल रहा एच-1बी प्रोग्राम अब भी अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहा है। यह वही प्रोग्राम है जिसकी आलोचना कभी अमेरिकी कर्मचारियों को ‘नुकसान पहुंचाने’ के लिए हुई, तो कभी इसे ‘दुनिया से टैलेंट लाने के लिए’ सराहा गया।
इसमें दो राय नही कि भारतीयों के लिए एच-1बी उम्मीदों का जरिया बन गया है। छोटे शहरों के लोग डॉलर कमाने लगे, परिवार मिडिल क्लास में पहुंच गए और एयरलाइंस से लेकर रियल एस्टेट तक की इंडस्ट्री ने विदेश जाने वाले भारतीयों की नई पीढ़ी को सर्विसेज़ देना शुरू किया।
वहीं अमेरिका के लिए इसका मतलब था टैलेंट का अंबार, जिसने लैब्स, क्लासरूम, अस्पताल और स्टार्टअप्स को भर दिया।
आज गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट आईबीएम जैसी कंपनियों को भारतीय मूल के सीईओ चला रहे हैं और अमेरिकी डॉक्टरों की वर्कफ़ोर्स में करीब 6% भारतीय डॉक्टर है। यानी एच-1बी प्रोग्राम में भारतीयों का दबदबा रहा है। हाल के वर्षों में 70% से ज़्यादा लाभार्थी भारतीय रहे हैं। चीन करीब 12% हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर है।
टेक सेक्टर में यह और भी साफ़ है। 2015 में फ़्रीडम ऑफ़ इंफ़ॉर्मेशन एक्ट के तहत हुई एक जांच में पाया गया कि “कंप्यूटर” कैटेगरी की 80% से ज़्यादा नौकरियां भारतीय नागरिकों को मिली थीं। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि यह अनुपात तब से ज़्यादा बदला नहीं है।
वही मेडिकल सेक्टर भी दांव पर है। 2023 में 8,200 से ज़्यादा एच-1बी वीज़ा जनरल मेडिसिन और सर्जिकल अस्पतालों में काम करने के लिए मंजूर किए गए।
भारत अंतरराष्ट्रीय मेडिकल ग्रेजुएट्स का सबसे बड़ा सोर्स ह। ये डॉक्टर अक्सर अमेरिका में एच-1बी वीज़ा पर होते हैं और सभी विदेशी डॉक्टरों का लगभग 22% हिस्सा हैं क्योंकि विदेशी डॉक्टर अमेरिका के कुल डॉक्टरों का करीब एक चौथाई हैं, इसलिए भारतीय एच-1बी धारक अमेरिकी डॉक्टरों का लगभग 5-6% हिस्सा बनाते हैं।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सैलरी के आँकड़े दिखाते हैं कि ट्रंप का नया एक लाख डॉलर फ़ीस वाला नियम व्यावहारिक नहीं है।
2023 में नए एच-1बी कर्मचारियों की औसत सैलरी 94,000 डॉलर थी, जबकि पहले से सिस्टम में मौजूद लोगों की औसत सैलरी 129,000 डॉलर थी।
चूंकि यह फ़ीस सिर्फ नए कर्मचारियों पर लगेगी, ज्यादातर लोग अपनी कमाई से इसे पूरा कर ही नहीं पाएंगे।
हालाँकि यह भी सच है कि ह्वाइट हाउस की ताज़ा गाइडलाइन कहती है कि फ़ीस सिर्फ नए एच-1बी आवेदकों पर लगेगी, इसलिए यह तुरंत नहीं बल्कि मध्यम और लंबे समय में कर्मचारियों की कमी पैदा करेगी। इस तरह भारत पर इसका असर पहले दिखेगा, लेकिन असली झटका अमेरिका को लग सकता है।
भारतीय आईटी कंपनियां जैसे टीसीएस और इन्फ़ोसिस पहले ही इस स्थिति से निपटने के लिए स्थानीय वर्कफोर्स तैयार कर रही हैं और काम को शिफ़्ट भी कर रही हैं।
प्यू रिसर्च के आँकड़े बताते हैं कि आज भी एच-1बी पाने वालों में 70% भारतीय हैं। लेकिन 2023 में टॉप 10 एच-1बी एंप्लॉयर्स में सिर्फ तीन का भारत से संबंध था, जबकि 2016 में यह संख्या छह थी।
फिर भी, भारत का 283 अरब डॉलर का आईटी सेक्टर अपने अमेरिकी मॉडल पर निर्भरता के कारण कठिनाई का सामना करेगा। इसका आधे से ज़्यादा राजस्व अमेरिका से आता है। वही अमेरिका पर भी इसका दूरगामी असर होगा । आशंका है कि ट्रंप के H-1B वीज़ा फ़ीस बढ़ाने के फ़ैसले से अमेरिका की यूनिवर्सिटीज़, अस्पताल और छोटे स्टार्ट अप्स पर बुरा असर पड़ सकता है जिससे
अमेरिका पर इसका असर गंभीर हो सकता है। अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी बढ़ सकती है, यूनिवर्सिटीज़ के लिए एसटीईएम छात्रों को आकर्षित करना मुश्किल हो जाएगा और छोटे स्टार्टअप्स, जिनके पास गूगल-अमेज़न जैसी लॉबिंग ताकत नहीं है, सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे। ऐसे मे यह वीज़ा फ़ीस अमेरिकी कंपनियों को मजबूर कर देगी कि वे अपनी हायरिंग पॉलिसी पूरी तरह बदलें और काफ़ी काम ऑफ़शोर भेजें। यह उन फ़ाउंडर्स और सीईओ को भी रोक देगा, जो अमेरिका में अपने बिज़नेस को संभालने आते हैं। यह अमेरिकी इनोवेशन और कंपीटिशन को बड़ा झटका देगा। सच है कि टेक और मेडिकल जैसे सेक्टरों में नए कर्मचारियों की मांग बढ़ रही है। ये सेक्टर इतने अहम और स्पेशलाइज्ड हैं कि अगर कुछ साल भी कमी रही तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा। वही यह कदम भारतीय स्किल्ड वर्कर्स को दूसरे देशों की तरफ़ देखने के लिए प्रेरित करेगा और इसका असर अमेरिकी यूनिवर्सिटी सिस्टम पर भी पड़ेगा।
वही इमीग्रेशन वकीलों का मानना है कि ट्रंप का यह कदम जल्द ही कानूनी चुनौती का सामना करेगा। इसके नतीजे असमान होंगे। नई एच-1बी पॉलिसी अमेरिका के लिए कई नकारात्मक नतीजे लाएगी, हालांकि यह देखने में वक्त लगेगा कि वे क्या होंगे।
उन्होंने उदाहरण दिया कि “क्योंकि कार्यकारी आदेश कुछ कंपनियों को छूट देता है, यह संभव है कि अमेज़न, एप्पल, गूगल और मेटा जैसी बड़ी कंपनियां एच-1बी फ़ीस नीति से बाहर निकलने का रास्ता खोज लें । अगर सबको छूट मिल गई, तो इस फ़ीस को लगाने का मकसद ही ख़त्म हो जाएगा।
ऐसे मे जैसे-जैसे हालात साफ़ होंगे, यह एच-1बी बदलाव विदेशी कर्मचारियों पर टैक्स कम और अमेरिकी कंपनियों और अर्थव्यवस्था के लिए एक तरह का स्ट्रेस टेस्ट ज़्यादा लगेगा।
अब यह इस पर निर्भर करेगा कि कंपनियां कैसे प्रतिक्रिया देती हैं। क्या अमेरिका इनोवेशन और टैलेंट में लीडर बना रहेगा या फिर ज़्यादा स्वागत करने वाली अर्थव्यवस्थाओं के सामने पिछड़ जाएगा।
प्राइवेट इक्विटी फंड्स को प्रवासी पेशेवरों के अनुभव से जोड़कर वित्तीय इकोसिस्टम को मज़बूत करना आवश्यक होगा।
वही दूसरी तरफ एच-वन-बी वीज़ा विवाद भारत के सामने दोहरी चुनौती पेश करता है। एक ओर लाखों प्रवासी भारतीयों की आजीविका और भविष्य की चिंता है, तो दूसरी ओर यही संकट भारत के लिए सुनहरा अवसर भी है। यदि भारत इस अवसर का लाभ उठाकर रिवर्स ब्रेन ड्रेन को अपनी ताकत बना लेता है तो आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को नई दिशा और ऊर्जा मिलेगी। संकट हमें यह याद दिलाता है कि आत्मनिर्भरता केवल नारे से नहीं बल्कि दूरदर्शी नीतियों और वैश्विक अवसरों को साधने की क्षमता से संभव है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं