उमेश कुमार सिंह
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार प्रत्येक वर्ष विश्वभर में लगभग 39 करोड़ लोग डेंगू वायरस से संक्रमित होते हैं। इनमें से लगभग 9 से 10 करोड़ लोगों में बीमारी के स्पष्ट लक्षण दिखाई देते हैं, जबकि बड़ी संख्या में संक्रमित व्यक्तियों में कोई लक्षण विकसित नहीं होते। वर्तमान समय में डेंगू भारत सहित अनेक देशों के लिए एक गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती बन चुका है और कई क्षेत्रों में यह महामारी जैसी स्थिति उत्पन्न कर चुका है।
डेंगू एक वायरल संक्रामक रोग है, जो मादा एडीज एजिप्टि मच्छर के काटने से फैलता है। संक्रमित मच्छर के काटने के बाद वायरस रक्त के माध्यम से पूरे शरीर में फैल जाता है। डेंगू वायरस के चार अलग अलग सीरोटाइप होते हैं। यदि किसी व्यक्ति को जीवन में एक बार डेंगू हो चुका है, तो दूसरी बार संक्रमण होने पर बीमारी अधिक गंभीर रूप ले सकती है और जटिलताओं की संभावना बढ़ जाती है।
पिछले कुछ वर्षों में मौसम संबंधी बदलावों ने डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी मच्छर जनित बीमारियों के प्रसार को बढ़ावा दिया है। बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, अधिक आर्द्रता तथा मौसम के असामान्य व्यवहार ने मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा की हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि वर्षा के बाद जमा होने वाला पानी मच्छरों के प्रजनन का प्रमुख स्रोत बनता है। वहीं गर्म और नम वातावरण में इनकी संख्या तेजी से बढ़ती है, जिससे संक्रमण फैलने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
डेंगू के शुरुआती लक्षणों में अचानक तेज बुखार, तीव्र सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, त्वचा पर चकत्ते, मतली, उल्टी तथा भूख में कमी शामिल हैं। जोड़ों और मांसपेशियों में अत्यधिक दर्द होने के कारण इसे कभी कभी “ब्रेक बोन फीवर” भी कहा जाता है। सामान्यतः बुखार कुछ दिनों में उतर जाता है, लेकिन शरीर को पूरी तरह स्वस्थ होने में कई सप्ताह लग सकते हैं। बड़े बच्चों और वयस्कों में इसके लक्षण अक्सर अधिक स्पष्ट और गंभीर दिखाई देते हैं।
अधिकांश मामलों में डेंगू सामान्य बुखार के रूप में ठीक हो जाता है, लेकिन कुछ रोगियों में यह डेंगू हेमोरेजिक फीवर या डेंगू शॉक सिंड्रोम जैसी गंभीर स्थितियों का रूप ले सकता है। ऐसी परिस्थितियों में रक्तस्राव, प्लेटलेट्स में तेजी से कमी तथा शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। समय पर उपचार न मिलने पर यह स्थिति जानलेवा भी साबित हो सकती है।
तेजी से बढ़ते शहरीकरण, अव्यवस्थित जल निकासी व्यवस्था और बदलती जीवनशैली के कारण ग्रामीण तथा उपशहरी क्षेत्रों में भी डेंगू के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। पश्चिम बंगाल, दिल्ली, केरल, तमिलनाडु, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य समय समय पर डेंगू के गंभीर प्रकोप का सामना करते रहे हैं।
उपचार मुख्य रूप से लक्षणों को नियंत्रित करने और रोगी की स्थिति पर निगरानी रखने पर आधारित होता है। यही कारण है कि डेंगू के मामले में बचाव को सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है। डेंगू की रोकथाम के लिए यह आवश्यक है कि घर, कार्यालय और आसपास के क्षेत्रों में मच्छरों को पनपने का अवसर न दिया जाए। पानी जमा होने वाले सभी स्थानों की नियमित सफाई की जानी चाहिए। फूलों के गमलों, कूलर, पानी की टंकियों, ड्रमों और अन्य जल संग्रहण पात्रों को समय समय पर साफ करना चाहिए तथा उनका पानी बदलते रहना चाहिए। जिन बर्तनों में पानी रखा जाता है, उन्हें हमेशा ढककर रखना चाहिए।
छतों, छज्जों और खुले स्थानों पर जमा वर्षा जल को नियमित रूप से हटाना चाहिए। पुराने टायर, नारियल के छिलके, खाली बोतलें और अन्य अनुपयोगी वस्तुएं, जिनमें पानी जमा हो सकता है, उन्हें नष्ट या उचित तरीके से हटाया जाना चाहिए। पानी की टंकियों के ढक्कन मजबूत और पूरी तरह बंद होने चाहिए तथा ओवरफ्लो पाइपों पर जाली लगाई जानी चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति को डेंगू जैसे लक्षण दिखाई दें, तो उसे तुरंत चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए। बुखार और दर्द की स्थिति में चिकित्सक की सलाह के अनुसार पैरासिटामोल का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन एस्पिरिन जैसी दवाओं से बचना चाहिए क्योंकि वे रक्तस्राव का जोखिम बढ़ा सकती हैं। रोगी को पर्याप्त आराम करना चाहिए और अधिक मात्रा में तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए ताकि शरीर में पानी की कमी न हो।
चूंकि डेंगू फैलाने वाले मच्छर मुख्य रूप से दिन के समय सक्रिय रहते हैं, इसलिए पूरे दिन सावधानी बरतना आवश्यक है। मच्छररोधी उपायों का उपयोग, स्वच्छता बनाए रखना तथा सामुदायिक जागरूकता बढ़ाना डेंगू नियंत्रण की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम हैं। यदि समाज के सभी वर्ग मिलकर इन उपायों को अपनाएं, तो डेंगू के बढ़ते खतरे को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। वास्तव में, डेंगू के विरुद्ध सबसे सफल और प्रभावी इलाज आज भी बचाव ही है।
डेंगू या किसी अन्य बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर स्वयं उपचार करने के बजाय योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें। किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह, निदान या उपचार के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर की राय सर्वोपरि है।
, एवीके न्यूज सर्विस