अर्जुन देशप्रेमी
मोरक्को से स्पेन में, ख़ासकर सेउटा में, मुसलमानों की घुसपैठ को लेकर यूरोप के देशों में बेचैनी देखी जा रही है। मुस्लिमों की यूरोप के देशों में घुसपैठ से वहां अनेक समस्याएं पैदा हुई हैं। परेशान होकर यूरोप के देशों ने अब अप्रवासियों और घुसपैठियों को रोकने के लिए अनेक कदम उठा रहे हैं। भारत भी घुसपैठियों की समस्या से परेशान है। ख़ासकर मुस्लिमों, रोहिंगियाओं की घुसपैठ से। सेउटा में अचानक से 60 हज़ार लोग एक साथ घुसने लगे तो समस्या विकराल हो गई । अगर इतनी बड़ी संख्या में लोग बांग्लादेश या पाकिस्तान या नेपाल या श्रीलंका से घुसने लगे तो क्या हाल होगा? ऐसे में सेउटा से भारत को क्या सबक मिलती है? स्पेन और मोरक्को की सीमा पर स्थित सेउटा यूरोप का वह हिस्सा है जो अफ्रीकी महाद्वीप के भीतर स्थित है। हाल ही में, इस छोटे से भू-भाग पर अचानक करीब साठ हजार लोगों के एक साथ धावा बोलने जैसी घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। एक ही दिन में इतनी विशाल भीड़ का अनियंत्रित तरीके से प्रवेश करने की कोशिश ने यूरोपीय देशों की सुरक्षा व्यवस्था की चूलें हिला दी हैं। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब अनियंत्रित अप्रवासन और घुसपैठ विकराल रूप लेती है, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रहता, बल्कि यह किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता, जनसांख्यिकी और आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट बन जाता है। ठीक ऐसी ही चुनौतियाँ आज भारत के सामने भी मुँह बाए खड़ी हैं, और सेउटा की यह घटना भारत के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यूरोप आज के समय में बड़े पैमाने पर अवैध प्रवासियों और घुसपैठ की समस्या से जूझ रहा है। विशेष तौर पर उत्तर अफ्रीका और मध्य पूर्व से आने वाले अप्रवासियों के कारण यूरोपीय समाजों में सांस्कृतिक टकराव, सामाजिक तनाव, संसाधनों पर दबाव और अपराध दर में वृद्धि जैसी समस्याएं पैदा हुई हैं। सेउटा की घटना ने इस आग में घी का काम किया है। जब एक साथ हजारों लोग सीमाओं को लांघकर भीतर घुसने का प्रयास करते हैं, तो राज्य की प्रशासनिक मशीनरी पूरी तरह चरमरा जाती है। यूरोपीय देश अब अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने, प्रवासियों को खदेड़ने और कड़े आव्रजन कानून बनाने के लिए मजबूर हो चुके हैं। वे समझ चुके हैं कि यदि समय रहते सीमाओं की रक्षा नहीं की गई, तो देश की मूल पहचान और आंतरिक स्थिरता दोनों खतरे में पड़ जाएंगे।
यदि सेउटा के इस भयावह परिदृश्य की तुलना भारत से की जाए, तो स्थिति और भी अधिक गंभीर नजर आती है। भारत अपनी विशाल सीमाओं के कारण लंबे समय से अवैध घुसपैठ की समस्या से जूझ रहा है। हमारे देश में विशेष रूप से बांग्लादेश, म्यांमार (रोहिंगिया) और अन्य पड़ोसी देशों से होने वाली अवैध घुसपैठ ने आंतरिक सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। भारत की जनसांख्यिकीय बनावट में घुसपैठ के कारण बड़े पैमाने पर बदलाव आ रहे हैं। पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर देश के महानगरों तक अवैध प्रवासियों के बस जाने से स्थानीय नागरिकों के रोजगार, जल, भूमि, और कल्याणकारी योजनाओं के संसाधनों पर भारी दबाव पड़ा है। कई संवेदनशील सीमावर्ती जिलों में तो स्थानीय संस्कृति और जनसांख्यिकी का संतुलन तक बिगड़ चुका है। कल्पना कीजिए कि अगर सेउटा की तरह ही बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल या श्रीलंका की सीमाओं से अचानक लाखों लोग संगठित या अनियंत्रित रूप से भारत में प्रवेश करने लगें, तो देश का हाल क्या होगा? भारत की जनसँख्या पहले ही अपने चरम पर है। यदि अचानक इतनी बड़ी संख्या में लोग देश में घुस आएँ, तो देश की स्वास्थ्य सेवाएं, परिवहन, खाद्यान्न आपूर्ति और आवास व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी। अवैध रूप से आने वाले इन तत्वों में देश विरोधी और चरमपंथी ताकतें आसानी से घुसपैठ कर सकती हैं। इससे देश के भीतर कानून-व्यवस्था का संकट खड़ा हो जाएगा और सांप्रदायिक सौहार्द हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगा।
संसाधनों की लूट और बेरोजगारी: हमारे देश के मूल नागरिकों के लिए बने संसाधनों पर इन घुसपैठियों का कब्जा हो जाएगा, जिससे स्थानीय युवाओं के लिए बेरोजगारी और गरीबी का संकट विकराल रूप ले लेगा।
सेउटा की घटना भारत की नीति निर्माताओं और सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक स्पष्ट आईना है। जैसे स्पेन अपनी सीमाओं को मजबूत करने के लिए नए कदम उठा रहा है, वैसे ही भारत को भी अपनी सीमाओं पर फेंसिंग, हाई-टेक सर्विलांस, ड्रोन तकनीक और चौबीसों घंटे निगरानी को और अधिक सख्त करना होगा। सीमा पर किसी भी प्रकार की ढिलाई घातक साबित हो सकती है।मानवाधिकार के नाम पर घुसपैठियों के प्रति नरमी दिखाने की नीति देश के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है। राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता किए बिना हर अवैध घुसपैठ से सख्ती से निपटना होगा। देश के भीतर अवैध रूप से रह रहे लोगों की पहचान कर उन्हें बाहर निकालना अनिवार्य है। पहचान पत्रों की कागजी प्रक्रिया को पारदर्शी और मजबूत बनाना होगा ताकि कोई भी बाहरी व्यक्ति आसानी से भारतीय नागरिक न बन सके। भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी भूमि का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों या अवैध पलायन के लिए लॉन्चपैड के रूप में न किया जाए। सेउटा की घटना कोई एक अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर अवैध घुसपैठ के बढ़ते खतरे की एक बानगी है। यूरोप के देशों ने देर से ही सही, लेकिन अब इस खतरे को भांप लिया है और कड़े कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। भारत के लिए यह समय आत्ममंथन और दूरदर्शी कार्रवाई का है। यदि आज हमने सेउटा से सबक नहीं लिया और अपनी सीमाओं व आंतरिक सुरक्षा को लेकर कड़े फैसले नहीं किए, तो आने वाली पीढ़ियों को एक भयानक जनसांख्यिकीय और आंतरिक संकट का सामना करना पड़ेगा। सुरक्षा से समझौता अब किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

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