रवि अरोड़ा

हाल ही में एक वैवाहिक समारोह में भाजपा के शिखर पुरुषों में से एक मुरली मनोहर जोशी से मुलाकात हुई । मैने कुशलक्षेम पूछा- कैसे हैं आप ? उत्तर में उन्होंने हंस कर कहा- मैं तो ठीक हूं मगर आप ठीक नहीं हैं। जाहिर है कि उनका कटाक्ष आज के दौर की पत्रकारिता पर था और एक पत्रकार को सामने पाकर उन्होंने यह कटाक्ष किया।
बात को बदलते हुए मैने कहा- मुल्क के हाल भी तो कुछ बताइए । इस पर उन्होंने कहा- मुल्क के हालात कौन से ठीक हैं । मैंने फिर एक सवाल दागा- ठीक कैसे होंगे। अब जोशी जी शायराना मूड में आ गए और उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर पढ़ डाला-

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

जोशी जी का इशारा किस ओर है यह समझते ही आसपास बैठे सभी लोग वाह वाह कह उठे मगर ठीक उनकी बगल में बैठे राजस्थान के पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्र ने अपने चेहरे पर किसी भी भाव को आने से जबरन रोक लिया । शायद उन्हें मोदी सरकार से अभी भी किसी तोहफ़े की उम्मीद रही होगी मगर जोशी जी तो जैसे अपनी ही रौ में थे। उम्र के इस पड़ाव में उन पर जैसे बैराग ही छाया हुआ है।
ग़ालिब और जोशी जी की इस बात से पता नहीं आप कितना सहमत हैं मगर मुझे तो यह बात ठीक ही लगती है कि दर्द का हद से बढ़ जाना भी कभी कभी इलाज बन जाता है। अब मोदी सरकार को ही देख लीजिए। हर संवैधानिक संस्था पर अपना कब्जा और उसका बेजा इस्तेमाल, हर मंत्रालय का पीएमओ से संचालन , हर छोटी बड़ी बात का श्रेय प्रधानमंत्री द्वारा स्वयं लेना, अखबार, टीवी और संचार के तमाम अन्य साधनों पर छा जाने का जतन और अपनी हर उपलब्धि का न भूतो न भविष्यति की तर्ज पर गुणगान करना ही क्या कम था जो राम मंदिर का श्रेय भी मोदी जी पूरी तरह अपनी झोली में डाल बैठे।
तमाम धर्मगुरुओं , राम मंदिर आंदोलन के नायकों, शहीदों के परिजन और तमाम राम भक्तों को दरकिनार कर मंदिर के भूमि पूजन , प्राण प्रतिष्ठा और ध्वजारोहण जैसे कार्यक्रम में मुख्य यजमान बनने, तमाम टीवी चैनल्स पर उसका लाइव टेलीकास्ट करवाने, अपनी देखरेख में मंदिर संचालन हेतु नई ट्रस्ट बनवाने और चुन चुन कर उसमें अपने ही लोगों को बैठाने जैसे सभी कार्य कर उन्होंने मंदिर के श्रेय की हिस्सेदारी किसी अन्य से बांटने से जैसे साफ इनकार कर दिया।
मगर अब राम मंदिर के चढ़ावे में चोरी और संचालन में गड़बड़ी की तमाम खबरों से उनकी अगली पिछली तमाम उपलब्धियों पर ही जैसे बट्टा लग गया है। यदि उन्होंने मंदिर का श्रेय अपनी पूरी पार्टी को दिया होता तो क्या तब भी उनकी इतनी ही निजी जलालत होती, शायद नहीं।
मैं ऐसा हरगिज नहीं कर रहा मगर राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे अनेक दिग्गजों के बयान सोशल मीडिया पर छाए हुए हैं जिसमें वे दावा कर रहे हैं कि राम मंदिर भाजपा और आरएसएस का कार्यालय बन गया है। मंदिर के लिए संघर्ष करने वालों में लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, प्रवीण तोगड़िया और साध्वी ऋतंभरा जैसे लोग प्रमुख थे मगर मंदिर निर्माण और उसके संचालन से उन्हें दूर ही रखा गया।
निर्मोही अखाड़ा और राम जन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति जैसी जिन संस्थाओं ने मंदिर आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाया उनका अब कहीं कोई नाम लेवा नहीं है। राम मंदिर आंदोलन के दौरान मोदी जी की भूमिका केवल गुजरात तक सीमित थी मगर बाद में उन्हें ही इस आंदोलन का सबसे बड़ा नायक घोषित कर दिया गया। कोई नहीं बता रहा कि मंदिर का सारा काम काज संभाल रहे चम्पत राय की योग्यता क्या है , क्या उन्हें मंदिर संचालन का कोई अनुभव था? क्या विहिप के सर्वेसर्वा अशोक सिंघल का सहयोगी होना अथवा मोदी जी को विष्णु का अवतार बता कर उनकी नजरों में चढ़ जाना ही काफी था? भाजपा और आरएसएस से जुड़े अधिकांश लोग दावा कर रहे हैं कि चंपत राय बेहद भले आदमी हैं।
तो क्या केवल भला आदमी होना ही मंदिर संचालन की योग्यता है? देश में करोड़ों लोग भले होंगे, क्या वे मंदिर की गुल्लक के पास फटक भी सकते हैं ? दावा किया जाता है कि चम्पत राय बेईमान नहीं हैं मगर यह कोई नहीं बताता कि किस आधार पर चंपत राय ने अपने नजदीकियों को ही मंदिर के सभी प्रमुख कार्य सौंपे थे ? पंद्रह बीस हजार की तनख्वाह वाले मंदिर के कर्मचारी बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूम रहे थे और करोड़ों की जमीनों के सौदे कर रहे थे, क्या यह उन्हें नहीं दिखा ? अब जब भेद खुल गया कि उनके आसपास के लोग ही गड़बड़ी कर रहे थे तो क्या उन्हें दोषी नहीं माना जाए? वही तो लाये थे इन लोगों को। और असली बात, यदि चंपत राय ही गड़बड़ी कर अथवा करवा रहे थे तो क्या उसकी जिम्मेदारी स्वयं मोदी जी की नहीं है? चंपत राय को तो उन्होंने ही तो मंदिर की कमान सौंपी थी।
पता चला है कि इस चोरी के खुलासे के बावजूद अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालु तो बेशक पहले जितने ही आ रहे हैं मगर अब चढ़ावा नहीं चढ़ा रहे। सबको पता चल गया है कि पैसा मंदिर में नहीं रामनाम की दुकान चलाने वालों की जेब में जाता है। आंकड़े बता रहे हैं कि चढ़ावे की राशि में नव्वे फीसदी तक की कमी आ गई है। मंदिर में दान काउंटर जहां कभी हजारों की भीड़ रहती थी अब पूरी तरह खाली पड़े हैं। क्या इसे मोदी जी की लोकप्रियता के कम होने से भी जोड़ कर देखा जाना चाहिए ? क्या इस हलाहल को पीने से वे बच सकते हैं ? क्या दर्द का हद से गुज़र जाना इसी को तो नहीं कहते?
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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